ये घर की बात जो बाज़ार तक नही आए। मेरी खबर किसी अख़बार तक नही आए।
ये घर की बात जो बाज़ार तक नही आए।
तुम्हारी याद में रुखसार तक नही आए।
असीर कर के हमें इश्क खैच लाया है।
जो हाथ कर गए दामन को तार तार मेरे।
थी फेस बुक पा हजारों से दोस्ती उनकी।
जला के घर न सियासत की रोटियां सेंकी।
ये और बात के चलना भी तुमने सीख लिया।
है ईट ईट मे मेहनत की रौशनी इतनी।
थीं जिनके पांव मे खुद्दार बेड़ियां अंजुम।
शायर
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