गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026
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शायर-ए-अहलेबैत मोहसिन अलीपुरी के 32 वर्षों की शायरी और ज़िक्र-ए-अहलेबैत की ख़िदमात के सफ़र पर ऐक नज़र

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शायर-ए-अहलेबैत मोहसिन अलीपुरी के 32 वर्षों की शायरी और ज़िक्र-ए-अहलेबैत की ख़िदमात के सफ़र पर ऐक नज़र

कर्नाटक के अलीपुर से निकलकर अपनी शायरी के ज़रिए हिंदुस्तान ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में पहचान बनाने वाले मोहसिन अलीपुरी साहब,कर्नाटक का नाम शायरी की दुनिया में ख़ास अहमियत रखता है। उनके अशआर, क़तआत और मनक़बतें अकीदतमंदों की महफ़िलों में पढ़ी और सुनी जाती हैं। उनके कलाम की ख़ास बात यह है कि उसमें अहलेबैत (अ.स.) से मोहब्बत, मौला अली (अ.स.) की शान, इल्म की अज़मत और हक़ की हिमायत जैसे जज़्बात नुमायाँ तौर पर दिखाई देते हैं।

मोहसिन अलीपुरी साहब की शायरी का सफ़र लगभग 32 वर्षों पर मुश्तमिल है। इतने लंबे अरसे से वह अल्लाह के करम और अहलेबैत (अ.स.) की अता से उनके ज़िक्र की ख़िदमत अंजाम दे रहे हैं। उनके अपने शब्दों में, वह पिछले 32 वर्षों से ज़िक्र-ए-अहलेबैत (अ.स.) से जुड़े हुए हैं और ख़ुद को शायर-ए-अहलेबैत कहलाना अपने लिए फख्र समझते हैं।

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मोहसिन अलीपुरी साहब का ताअल्लुक़ एक ऐसे ख़ानदान से है, जहाँ मरसिये और अहलेबैत (अ.स.) के ज़िक्र की परंपरा पहले से मौजूद रही है। उनके वालिद का नाम सैयद मुस्तफ़ा हुसैन था, जो मरसिया-ख़्वाँ थे। इस तरह अहलेबैत (अ.स.) की मोहब्बत और उनके ज़िक्र से जुड़ा माहौल उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का भी हिस्सा रहा है।

शायरी केवल अल्फ़ाज़ को एक ख़ास अंदाज़ में बयान करने का नाम नहीं, बल्कि दिल में मौजूद जज़्बात को दूसरों के दिलों तक पहुँचाने की कला भी है। जब यही शायरी अहलेबैत (अ.स.) की मदह और उनकी अज़मत के बयान के लिए इस्तेमाल होती है, तो उसका रंग और भी ख़ास हो जाता है। मोहसिन अलीपुरी साहब ने अपने कलाम के ज़रिए इसी अदबी और अकीदती परंपरा में अपनी पहचान बनाई है।

मौला अली (अ.स.) की शान में मशहूर क़तआ मोहसिन अलीपुरी साहब के कलाम में मौला अली (अ.स.) की शान और ज़ुल्फ़िकार का बयान ख़ास तौर पर क़ाबिले- ज़िक्र है। उनका यह क़तआ सुनने वालों के बीच ख़ूब मक़बूल हुआ। इसके अशआर में मौला अली (अ.स.) की शुजाअत और ज़ुल्फ़िकार की अज़मत को पुरअसर अंदाज़ में बयान किया गया है। इस क़तआ की शोहरत का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि इसके अशआर आज भी अकीदतमंदों की ज़बान पर रहते हैं।

मोहसिन अलीपुरी साहब का मशहूर क़तआ:

जो मुर्तुज़ा के हाथ में आई थी ज़ुल्फ़िकार।

वो अर्श पर ख़ुदा ने बनाई थी ज़ुल्फ़िकार।।

जिबरील ने परों को ज़मीं पर बिछाया था।

ख़ैबर में जब अली ने चलाई थी ज़ुल्फ़िकार।।

मोहसिन अलीपुरी, कर्नाटक

इन अशआर में शायर ने मौला अली (अ.स.) की शुजाअत और ख़ैबर के ऐतिहासिक वाक़िये को अपने ख़ास अंदाज़ में बयान किया है। क़तआ की रवानी, अल्फ़ाज़ का चुनाव और मौज़ू की ताक़त इसे यादगार बनाते हैं। यही वजह है कि यह कलाम शायर की पहचान से जुड़ी हुई रचनाओं में गिना जाता है।

जश्न-ए-कुलसूम में हज़रत अब्बास (अ.स.) की आमद का ख़ूबसूरत बयान

मोहसिन अलीपुरी साहब का एक और मशहूर क़तआ जश्न-ए- कुलसूम और हज़रत ज़ैनब (स.अ.) व हज़रत कुलसूम (स.अ.) की मदह से जुड़ा है। इसमें उन्होंने अकीदत और हज़रत अब्बास (अ.स.) की आमद के तसव्वुर को बड़े दिलकश अंदाज़ में पेश किया है।

उनके इस क़तआ की ख़ास बात यह है कि इसमें महफ़िल के मंज़र को अल्फ़ाज़ के ज़रिए इस तरह पेश किया गया है कि सुनने वाला भी उस अकीदती माहौल को महसूस करने लगता है।

मोहसिन अलीपुरी साहब का मशहूर क़तआ:

जिस जगह ज़ैनब ओ कुलसूम की मिदहत होगी।

मेरे मोहसिन वहाँ अल्लाह की रहमत होगी।।

बा-अदब जश्न में पलकों को बिछाकर बैठो।

जश्न-ए-कुलसूम में अब्बास की आमद होगी।।

मोहसिन अलीपुरी, कर्नाटक

यह क़तआ उनकी अकीदत और तख़य्युल की ख़ूबसूरत मिसाल है। इसमें महफ़िल की रौनक़ के साथ-साथ अदब और एहतराम का पैग़ाम भी मिलता है।

ज़िक्र-ए-मौला अली (अ.स.) और मोहब्बत का इज़हार

मोहसिन अलीपुरी साहब की शायरी का एक अहम पहलू मौला अली (अ.स.) की मदह और उनके ज़िक्र से उनकी वाबस्तगी है। उनके अशआर में यह जज़्बा साफ़ महसूस होता है कि मौला अली (अ.स.) का ज़िक्र उनके लिए महज़ शायरी का मौज़ू नहीं, बल्कि दिली अकीदत का इज़हार है।

उनके चार मिसरों पर मुश्तमिल इस क़तआ में यही जज़्बा नुमायाँ है:

जो ज़िक्र करता हूँ मौला का आके महफ़िल में।

ऐ बिन्ते मुरसले आज़म तेरी ख़ुशी के लिए।।

ख़ुदा का सजदा अगर दरमियाँ में न होता।

अली का ज़िक्र ही काफ़ी था ज़िंदगी के लिए।।

मोहसिन अलीपुरी, कर्नाटक

इन अशआर में शायर ने मौला अली (अ.स.) से अपनी मोहब्बत और उनके ज़िक्र से अपनी रूहानी वाबस्तगी का इज़हार किया है। उनकी शायरी की यही विशेषता है कि वह अपने अकीदती जज़्बात को सीधे और असरदार अंदाज़ में पेश करते हैं।

हक़ की हिमायत और कर्बला के पैग़ाम पर आधारित कलाम

मोहसिन अलीपुरी साहब की शायरी केवल मदह और मनक़बत तक सीमित नहीं है। उनके कलाम में हक़ और सच्चाई की हिमायत भी दिखाई देती है। वह अपने अशआर के ज़रिए सच्चाई पर क़ायम रहने और ज़ुल्म के सामने न झुकने का पैग़ाम देते हैं।

उनका यह क़तआ इसी जज़्बे को बयान करता है:

झूठे इंसान को सच्चा नहीं होने देंगे।

हम कभी सच्चे को झूठा नहीं होने देंगे।।

अमरीका देखना हम कर्बोबला वाले हैं।

ख़्वाब तेरा कभी पूरा नहीं होने देंगे।।

मोहसिन अलीपुरी, कर्नाटक

इन अशआर में कर्बला के उसूलों से जुड़ी हक़परस्ती और इस्तिक़ामत का इज़हार मिलता है। शायर ने सच्चाई के पक्ष में खड़े रहने और अपने उसूलों पर क़ायम रहने का संदेश दिया है।

इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की मदह में भी उन्होंने यादगार मनक़बत पेश की,मोहसिन अलीपुरी साहब की मनक़बतों में इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) की शान में कही गई मनक़बत भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस मनक़बत के अशआर में इमाम बाक़िर (अ.स.) के इल्मी मक़ाम, उनकी मदह और उनके ज़िक्र की बरकत को ख़ूबसूरत अंदाज़ में बयान किया गया है।

इस कलाम की विशेषता यह है कि इसके अशआर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और पूरी मनक़बत में शायर का अकीदती अंदाज़ बरक़रार रहता है। इसके कई शेर अपनी जगह गहरे मायने रखते हैं और सुनने वाले को सोचने पर मजबूर करते हैं।

मोहसिन अलीपुरी साहब की मशहूर मनक़बत:

बात हक़ की छिड़ी जहाँ बाक़िर।

ज़िक्र तेरा हुआ वहाँ बाक़िर।।

तूने खोली ज़बा जहाँ बाक़िर।

इंक़लाब आ गया वहाँ बाक़िर।।

जिस गली से गुज़रा हुआ तेरा।इल्म के गुल खिले वहाँ बाक़िर।।

हक़ तेरे साथ-साथ चलता है।

जाएगा तू जहाँ जहाँ बाक़िर।।

तेरी मिदहत के वास्ते मैंने।

वक़्फ़ कर दी है ये ज़बाँ बाक़िर।।

क्या ढली रात तेरी मिदहत में।

हो गई सुबह की अज़ाँ बाक़िर।।

मरहबा ज़िक्र-ए-कर्बला के तुफ़ैल।

मेरा आबाद है मकाँ बाक़िर।।

तेरे मोहसिन को ज़िक्र-ए-हैदर से।

मिल गया ख़ुल्द में मकाँ बाक़िर।।

इस मनक़बत में इमाम बाक़िर (अ.स.) के इल्मी मक़ाम और उनकी मदह के साथ-साथ मौला अली (अ.स.) के ज़िक्र से शायर की गहरी मोहब्बत भी झलकती है। विशेष रूप से “तूने खोली ज़बाँ जहाँ बाक़िर, इंक़लाब आ गया वहाँ बाक़िर” जैसे शेर में इल्म और हक़ की आवाज़ के असर को प्रभावशाली अंदाज़ में बयान किया गया है।

वहीं, “तेरी मिदहत के वास्ते मैंने, वक़्फ़ कर दी है ये ज़बाँ बाक़िर” के ज़रिए शायर ने अपनी ज़बान को इमाम की मदह के लिए वक़्फ़ करने के जज़्बे को बयान किया है। यह शेर मोहसिन अलीपुरी साहब की शायरी के बुनियादी जज़्बे को समझने में मदद करता है।

हज़ारों अशआर में महफ़ूज़ है मोहसिन अलीपुरी की अदबी पहचान

ऊपर पेश किए गए क़तआत और मनक़बतें मोहसिन अलीपुरी साहब की शायरी के कुछ चुनिंदा नमूने हैं। उनके कलाम का दायरा इन रचनाओं तक सीमित नहीं है। उनके हज़ारों अशआर और कई मनक़बतें ऐसी हैं, जो अलग-अलग महफ़िलों में पढ़ी जाती हैं और अकीदतमंदों के दिलों में अपनी जगह बनाए हुए हैं।

किसी शायर की असल पहचान उसके कलाम की उस ताक़त से बनती है, जो महफ़िल ख़त्म होने के बाद भी सुनने वालों के ज़ेहन में बाक़ी रहती है। मोहसिन अलीपुरी साहब के मशहूर अशआर का बार-बार पढ़ा जाना और लोगों की ज़बान पर रहना उनकी शायरी की मक़बूलियत को बयान करता है।

उनकी शायरी में मौला अली (अ.स.) की शुजाअत, इमाम बाक़िर (अ.स.) की मदह, हज़रत ज़ैनब (स.अ.) और हज़रत कुलसूम (स.अ.) की अज़मत तथा कर्बला के पैग़ाम जैसे मौज़ूआत देखने को मिलते हैं। इन विभिन्न विषयों के माध्यम से उनका कलाम अहलेबैत (अ.स.) से मोहब्बत रखने वाले लोगों तक पहुँचता है।

कर्नाटक के अलीपुर से ताल्लुक़ रखने वाले मोहसिन अलीपुरी साहब का 32 वर्षों का यह सफ़र ए शायरी, अकीदत और ज़िक्र-ए-अहलेबैत (अ.स.) की ख़िदमत से जुड़ा हुआ है। उनके वालिद सैयद मुस्तफ़ा हुसैन की मरसिया-ख़्वानी की विरासत और उनकी अपनी अदबी मेहनत, दोनों उनके परिचय के अहम पहलू हैं।

मोहसिन अलीपुरी साहब की शायरी का यह सफ़र इस बात को उजागर करता है कि सच्चे जज़्बात से निकले हुए अल्फ़ाज़ लोगों के दिलों में जगह बना लेते हैं। उनके कलाम के चुनिंदा अशआर और मनक़बतें आज भी महफ़िलों में उनकी अदबी पहचान को ताज़ा करती हैं। अहलेबैत (अ.स.) की मदह को अपनी ज़िंदगी के 32 वर्षों की ख़िदमत का हिस्सा बनाने वाले मोहसिन अलीपुरी साहब का नाम शायर-ए-अहलेबैत की दुनिया में इसी अकीदत और शायरी के हवाले से याद किया जाता है।

 

شاعرِ اہلِ بیتؑ محسن علی پوری کی 32 سالہ شاعری اور ذکرِ اہلِ بیتؑ کی خدمات کے سفر پر ایک نظر

ذکی بھارتی ✍🏼

کرناٹک کے علی پور سے تعلق رکھنے والے محسن علی پوری صاحب نے اپنی شاعری کے ذریعے نہ صرف ہندوستان بلکہ دنیا بھر میں اپنی ایک منفرد شناخت قائم کی ہے۔ شاعری کی دنیا میں ان کا نام خاص اہمیت رکھتا ہے۔ ان کے اشعار، قطعات اور منقبتیں عقیدت مندوں کی محفلوں میں پڑھی اور سنی جاتی ہیں۔ ان کے کلام کی خاص بات یہ ہے کہ اس میں اہلِ بیتؑ سے محبت، مولا علیؑ کی شان، علم کی عظمت اور حق کی حمایت جیسے جذبات نمایاں طور پر نظر آتے ہیں۔

محسن علی پوری صاحب کی شاعری کا سفر تقریباً 32 برسوں پر مشتمل ہے۔ اتنے طویل عرصے سے وہ اللہ کے کرم اور اہلِ بیتؑ کی عطا سے ان کے ذکر کی خدمت انجام دے رہے ہیں۔ ان کے اپنے الفاظ میں، وہ گزشتہ 32 برسوں سے ذکرِ اہلِ بیتؑ سے وابستہ ہیں اور خود کو شاعرِ اہلِ بیت کہلانا اپنے لیے باعثِ فخر سمجھتے ہیں۔

محسن علی پوری صاحب کا تعلق ایک ایسے خاندان سے ہے جہاں مرثیے اور ذکرِ اہلِ بیتؑ کی روایت پہلے سے موجود رہی ہے۔ ان کے والد کا نام سید مصطفیٰ حسین تھا، جو خود مرثیہ خواں تھے۔ اس طرح اہلِ بیتؑ کی محبت اور ان کے ذکر سے وابستہ ماحول ان کے خاندانی پس منظر کا بھی حصہ رہا ہے۔

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شاعری محض الفاظ کو ایک خاص انداز میں بیان کرنے کا نام نہیں، بلکہ دل میں موجود جذبات کو دوسروں کے دلوں تک پہنچانے کا ایک فن بھی ہے۔ جب یہی شاعری اہلِ بیتؑ کی مدح اور ان کی عظمت کے بیان کے لیے استعمال ہوتی ہے تو اس کا رنگ اور بھی خاص ہو جاتا ہے۔ محسن علی پوری صاحب نے اپنے کلام کے ذریعے اسی ادبی اور عقیدتی روایت میں اپنی شناخت قائم کی ہے۔

مولا علیؑ کی شان میں مشہور قطعہ

محسن علی پوری صاحب کے کلام میں مولا علیؑ کی شان اور ذوالفقار کا بیان خاص طور پر قابلِ ذکر ہے۔ ان کا یہ قطعہ سامعین کے درمیان بے حد مقبول ہوا۔ اس کے اشعار میں مولا علیؑ کی شجاعت اور ذوالفقار کی عظمت کو پُراثر انداز میں بیان کیا گیا ہے۔ اس قطعے کی شہرت کا اندازہ اس بات سے لگایا جا سکتا ہے کہ اس کے اشعار آج بھی عقیدت مندوں کی زبان پر ہیں۔

محسن علی پوری صاحب کا مشہور قطعہ:

جو مرتضیٰ کے ہاتھ میں آئی تھی ذوالفقار۔

وہ عرش پر خدا نے بنائی تھی ذوالفقار۔

جبرئیل نے پروں کو زمیں پر بچھایا تھا۔

خیبر میں جب علی نے چلائی تھی ذوالفقار۔

محسن علی پوری، کرناٹک

ان اشعار میں شاعر نے مولا علیؑ کی شجاعت اور خیبر کے تاریخی واقعے کو اپنے خاص انداز میں بیان کیا ہے۔ قطعے کی روانی، الفاظ کا انتخاب اور موضوع کی تاثیر اسے یادگار بناتے ہیں۔ یہی وجہ ہے کہ یہ کلام شاعر کی شناخت سے وابستہ نمایاں تخلیقات میں شمار ہوتا ہے۔

جشنِ کلثوم میں حضرت عباسؑ کی آمد کا خوب صورت بیان

محسن علی پوری صاحب کا ایک اور مشہور قطعہ جشنِ کلثوم اور حضرت زینبؑ و حضرت کلثومؑ کی مدح سے تعلق رکھتا ہے۔ اس میں انہوں نے عقیدت اور حضرت عباسؑ کی آمد کے تصور کو بڑے دلکش انداز میں پیش کیا ہے۔

اس قطعے کی خاص بات یہ ہے کہ اس میں محفل کے منظر کو الفاظ کے ذریعے اس طرح پیش کیا گیا ہے کہ سننے والا بھی اس عقیدتی ماحول کو محسوس کرنے لگتا ہے۔

محسن علی پوری صاحب کا مشہور قطعہ:

جس جگہ زینب و کلثوم کی مدحت ہوگی۔

میرے محسن وہاں اللہ کی رحمت ہوگی۔

باادب جشن میں پلکوں کو بچھا کر بیٹھو۔

جشنِ کلثوم میں عباس کی آمد ہوگی۔

محسن علی پوری، کرناٹک

یہ قطعہ ان کی عقیدت اور تخیل کی خوب صورت مثال ہے۔ اس میں محفل کی رونق کے ساتھ ساتھ ادب و احترام کا پیغام بھی ملتا ہے۔

ذکرِ مولا علیؑ اور محبت کا اظہار

محسن علی پوری صاحب کی شاعری کا ایک اہم پہلو مولا علیؑ کی مدح اور ان کے ذکر سے ان کی وابستگی ہے۔ ان کے اشعار میں یہ جذبہ صاف محسوس ہوتا ہے کہ مولا علیؑ کا ذکر ان کے لیے محض شاعری کا موضوع نہیں، بلکہ دلی عقیدت کا اظہار ہے۔

ان کے چار مصرعوں پر مشتمل اس قطعے میں یہی جذبہ نمایاں ہے:

جو ذکر کرتا ہوں مولا کا آ کے محفل میں۔

اے بنتِ مرسلِ اعظم تیری خوشی کے لیے۔

خدا کا سجدہ اگر درمیاں میں نہ ہوتا۔

علی کا ذکر ہی کافی تھا زندگی کے لیے۔

محسن علی پوری، کرناٹک

ان اشعار میں شاعر نے مولا علیؑ سے اپنی محبت اور ان کے ذکر سے اپنی روحانی وابستگی کا اظہار کیا ہے۔ ان کی شاعری کی یہی خصوصیت ہے کہ وہ اپنے عقیدتی جذبات کو براہِ راست اور پُراثر انداز میں پیش کرتے ہیں۔

حق کی حمایت اور کربلا کے پیغام پر مبنی کلام

محسن علی پوری صاحب کی شاعری صرف مدح اور منقبت تک محدود نہیں ہے۔ ان کے کلام میں حق اور سچائی کی حمایت بھی دکھائی دیتی ہے۔ وہ اپنے اشعار کے ذریعے سچائی پر قائم رہنے اور ظلم کے سامنے نہ جھکنے کا پیغام دیتے ہیں۔

ان کا یہ قطعہ اسی جذبے کو بیان کرتا ہے:

جھوٹے انسان کو سچا نہیں ہونے دیں گے۔

ہم کبھی سچے کو جھوٹا نہیں ہونے دیں گے۔

امریکہ دیکھنا ہم کرب و بلا والے ہیں۔

خواب تیرا کبھی پورا نہیں ہونے دیں گے۔

محسن علی پوری، کرناٹک

ان اشعار میں کربلا کے اصولوں سے وابستہ حق پرستی اور استقامت کا اظہار ملتا ہے۔ شاعر نے سچائی کے حق میں کھڑے رہنے اور اپنے اصولوں پر قائم رہنے کا پیغام دیا ہے۔

امام محمد باقرؑ کی مدح میں بھی پیش کی یادگار منقبت

محسن علی پوری صاحب کی منقبتوں میں امام محمد باقرؑ کی شان میں کہی گئی منقبت بھی خصوصی طور پر قابلِ ذکر ہے۔ اس منقبت کے اشعار میں امام باقرؑ کے علمی مقام، ان کی مدح اور ان کے ذکر کی برکت کو خوب صورت انداز میں بیان کیا گیا ہے۔

اس کلام کی خصوصیت یہ ہے کہ اس کے اشعار ایک دوسرے سے مربوط ہیں اور پوری منقبت میں شاعر کا عقیدتی انداز برقرار رہتا ہے۔ اس کے کئی اشعار اپنے اندر گہرے معنی رکھتے ہیں اور سننے والے کو غور و فکر پر آمادہ کرتے ہیں۔

محسن علی پوری صاحب کی مشہور منقبت:

بات حق کی چھڑی جہاں باقر۔

ذکر تیرا ہوا وہاں باقر۔

تو نے کھولی زباں جہاں باقر۔

انقلاب آ گیا وہاں باقر۔

جس گلی سے گزرا ہوا تیرا۔

علم کے گل کھلے وہاں باقر۔

حق تیرے ساتھ ساتھ چلتا ہے۔

جائے گا تو جہاں جہاں باقر۔

تیری مدحت کے واسطے میں نے۔

وقف کر دی ہے یہ زباں باقر۔

کیا ڈھلی رات تیری مدحت میں۔

ہو گئی صبح کی اذاں باقر۔

مرحبا ذکرِ کربلا کے طفیل۔

میرا آباد ہے مکاں باقر۔

تیرے محسن کو ذکرِ حیدر سے۔

مل گیا خلد میں مکاں باقر۔

محسن علی پوری، کرناٹک

اس منقبت میں امام باقرؑ کے علمی مقام اور ان کی مدح کے ساتھ ساتھ مولا علیؑ کے ذکر سے شاعر کی گہری محبت بھی جھلکتی ہے۔ خاص طور پر:

تو نے کھولی زباں جہاں باقر۔

انقلاب آ گیا وہاں باقر۔

جیسے اشعار میں علم اور حق کی آواز کے اثر کو مؤثر انداز میں بیان کیا گیا ہے۔

اسی طرح:

تیری مدحت کے واسطے میں نے۔

وقف کر دی ہے یہ زباں باقر۔

کے ذریعے شاعر نے اپنی زبان کو امامؑ کی مدح کے لیے وقف کرنے کے جذبے کو بیان کیا ہے۔ یہ شعر محسن علی پوری صاحب کی شاعری کے بنیادی جذبے کو سمجھنے میں مدد دیتا ہے۔

ہزاروں اشعار میں محفوظ ہے محسن علی پوری کی ادبی شناخت

اوپر پیش کیے گئے قطعات اور منقبتیں محسن علی پوری صاحب کی شاعری کے چند منتخب نمونے ہیں۔ ان کے کلام کا دائرہ ان تخلیقات تک محدود نہیں ہے۔ ان کے ہزاروں اشعار اور کئی منقبتیں ایسی ہیں جو مختلف محفلوں میں پڑھی جاتی ہیں اور عقیدت مندوں کے دلوں میں اپنی جگہ بنائے ہوئے ہیں۔

کسی شاعر کی اصل شناخت اس کے کلام کی اس تاثیر سے بنتی ہے جو محفل ختم ہونے کے بعد بھی سننے والوں کے ذہنوں میں باقی رہتی ہے۔ محسن علی پوری صاحب کے مشہور اشعار کا بار بار پڑھا جانا اور لوگوں کی زبان پر رہنا ان کی شاعری کی مقبولیت کو ظاہر کرتا ہے۔

ان کی شاعری میں مولا علیؑ کی شجاعت، امام باقرؑ کی مدح، حضرت زینبؑ اور حضرت کلثومؑ کی عظمت اور کربلا کے پیغام جیسے موضوعات دیکھنے کو ملتے ہیں۔ ان مختلف موضوعات کے ذریعے ان کا کلام اہلِ بیتؑ سے محبت رکھنے والے لوگوں تک پہنچتا ہے۔

کرناٹک کے علی پور سے تعلق رکھنے والے محسن علی پوری صاحب کا 32 سالہ یہ سفر شاعری، عقیدت اور ذکرِ اہلِ بیتؑ کی خدمت سے وابستہ ہے۔ ان کے والد سید مصطفیٰ حسین کی مرثیہ خوانی کی وراثت اور ان کی اپنی ادبی محنت، دونوں ان کے تعارف کے اہم پہلو ہیں۔

محسن علی پوری صاحب کی شاعری کا یہ سفر اس بات کو نمایاں کرتا ہے کہ سچے جذبات سے نکلنے والے الفاظ لوگوں کے دلوں میں جگہ بنا لیتے ہیں۔ ان کے کلام کے منتخب اشعار اور منقبتیں آج بھی محفلوں میں ان کی ادبی شناخت کو تازہ کرتی ہیں۔ اہلِ بیتؑ کی مدح کو اپنی زندگی کے 32 برسوں کی خدمت کا حصہ بنانے والے محسن علی پوری صاحب کا نام شاعرِ اہلِ بیت کی دنیا میں اسی عقیدت اور شاعری کے حوالے سے یاد کیا جاتا ہے۔

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