रविवार, 18 अक्टूबर 2026
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गंगा-जमुनी तहज़ीब से धार्मिक नफ़रत तक: मुताह, हलाल और नियोग पर चर्चा

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गंगा-जमुनी तहज़ीब से धार्मिक नफ़रत तक: मुताह, हलाल और नियोग पर चर्चा

इधर निरंतर कई वर्षों से मैं देख रहा हूँ कि सोशल मीडिया पर एक-दूसरे के धर्म पर कटाक्ष करने के नाम पर नफ़रत का ज़हर घोला जा रहा है। यदि हम लगभग 15 वर्ष पीछे लौटकर देखें, तो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जो प्यार-मोहब्बत, भाईचारा और अपनापन था, उसके बीच धीरे-धीरे एक लंबी और गहरी खाई बनती जा रही है।

हम लखनऊ वालों ने वह दौर भी देखा है, जब हिंदुओं के त्योहारों में मुसलमान इस तरह शामिल होते थे, मानो वह उनका अपना त्योहार हो। अखंड रामायण हो, सुंदरकांड हो, होली हो, दीपावली हो या कोई अन्य आयोजन—हमारे हिंदू भाइयों की खुशियों में मुसलमान भी उसी उत्साह से शरीक होते थे। इसी तरह मोहर्रम की मजलिसों, ताजियों, 13 रजब की नज़र और मुसलमानों के दूसरे धार्मिक आयोजनों में हमारे हिंदू भाई भी शामिल होते थे। यही लखनऊ की गंगा-जमुनी तहज़ीब थी, जहाँ इंसान की पहचान सबसे पहले उसके व्यवहार और मोहब्बत से होती थी।

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लेकिन आज सोशल मीडिया पर धार्मिक कटाक्ष, अधूरी जानकारी और कट्टरपंथी सोच ने इस तहज़ीब को गहरी चोट पहुँचाई है। आज स्थिति यह है कि एक व्यक्ति दूसरे धर्म की किसी प्रथा पर सवाल उठाने से पहले अपने धर्म की किताबों को पढ़ना भी ज़रूरी नहीं समझता। मेरा यह लेख इसी समस्या पर है।

सबसे पहले मैं स्पष्ट कर दूँ कि मेरा उद्देश्य अपने हिंदू मित्रों, साथियों या हिंदू धर्म की आस्था को ठेस पहुँचाना नहीं है। मेरे अनेक हिंदू मित्र हैं और मैं उनके साथ उसी मोहब्बत से रहता हूँ, जिस मोहब्बत की अपेक्षा अपने लिए करता हूँ। मेरा उद्देश्य उन कट्टरपंथी लोगों को जवाब देना है, जो इस्लाम के बारे में आधी-अधूरी जानकारी लेकर मुसलमानों का मज़ाक उड़ाते हैं। और यही बात उन कट्टरपंथी मुसलमानों पर भी लागू होती है, जो दूसरे धर्मों के लोगों का अपमान करते हैं।

हलाला और मुताह पर सवाल करने वालों को मेरी सलाह

पिछले कुछ समय से कुछ लोग जानवरों की बलि और मांसाहार के विषय में इस्लाम पर सवाल उठाते रहे हैं। सवाल करना गलत नहीं है, लेकिन सवाल करने से पहले अपने धार्मिक साहित्य को भी पढ़ना चाहिए। उदाहरण के लिए, मनुस्मृति के पाँचवें अध्याय में मांसाहार, मांस के सेवन और उससे जुड़े धार्मिक तर्कों का उल्लेख मिलता है। इस विषय पर हिंदू परंपराओं में भी अलग-अलग मत रहे हैं। इसलिए किसी एक प्रथा के आधार पर पूरे धर्म के सभी अनुयायियों का मज़ाक उड़ाना उचित नहीं है।

इसके बाद कुछ लोगों ने हलाला के नाम पर इस्लाम का मज़ाक उड़ाना शुरू किया। मैंने इस विषय पर पहले भी अपने फेसबुक पेज पर लिखा है और सवाल करने वालों को उनके सवालों के जवाब दिए हैं। जब हलाला पर चर्चा हुई, तो कुछ लोगों ने मुताह का मुद्दा उठा दिया और कहा कि इस्लाम में मुताह के बारे में भी स्पष्ट जवाब दिया जाए।

मैंने मुताह पर भी जवाब देने का प्रयास किया। लेकिन मेरी मुस्लिम भाइयों से भी एक गुज़ारिश है: यदि कोई आपसे इस्लाम के बारे में सवाल करता है, तो उसे गाली देकर या अभद्र भाषा का प्रयोग करके जवाब मत दीजिए। यदि आप कुरान, हदीस और अपने धार्मिक सिद्धांतों को जानते हैं, तो दलील से जवाब दीजिए। सामने वाला आपकी दलील से सहमत हो या न हो, यह अलग बात है; लेकिन आपकी भाषा आपके ज्ञान और चरित्र की पहचान होती है।

मुताह की वास्तविक चर्चा क्या है?

मुताह एक निश्चित अवधि के लिए किया जाने वाला विवाह है, जिसे शिया इस्लामी परंपरा में कुछ निर्धारित शर्तों के अधीन वैध माना जाता है। सुन्नी इस्लामी परंपरा में इसे सामान्यतः निषिद्ध माना जाता है। यानी इस विषय पर मुसलमानों के बीच भी मतभेद मौजूद हैं।

मुताह को केवल अय्याशी का दूसरा नाम बता देना सही धार्मिक चर्चा नहीं है। इसके समर्थक इसे एक निर्धारित धार्मिक व्यवस्था मानते हैं, जिसमें अवधि और मेहर जैसी शर्तें होती हैं। लेकिन यह भी उतना ही ज़रूरी है कि कोई व्यक्ति इस व्यवस्था का नाम लेकर महिलाओं का शोषण न करे, किसी की मजबूरी का लाभ न उठाए और धार्मिक अनुमति का दावा करके अपनी मनमानी को जायज़ न ठहराए।

मेरी आपत्ति उन लोगों से है, जो बिना पूरी जानकारी के किसी धार्मिक व्यवस्था को केवल मज़ाक का विषय बना देते हैं। किसी व्यवस्था के पक्ष या विपक्ष में तर्क दिया जा सकता है, लेकिन उसके बारे में तथ्य जाने बिना फैसला सुनाना ज्ञान नहीं है।

हलाला पर भी अधूरी जानकारी के आधार पर फैसला मत कीजिए

हलाला के विषय में भी बहुत-सी बातें सोशल मीडिया पर अधूरी या भ्रामक रूप में प्रस्तुत की जाती हैं। इस्लामी कानून की प्रचलित व्याख्या के अनुसार, यदि किसी विवाह में अंतिम और प्रभावी तलाक हो चुका है, तो पहले पति से दोबारा विवाह की अनुमति के लिए कुछ विशेष शर्तें लागू होती हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि किसी महिला को योजनाबद्ध तरीके से किसी दूसरे पुरुष से विवाह करने और फिर तलाक लेने के लिए मजबूर किया जाए।

पहले पति और पत्नी के बीच संबंध टूटने के अनेक कारण हो सकते हैं। ऐसे में किसी महिला की इच्छा, सम्मान और स्वतंत्रता की अनदेखी करके उसे किसी योजना के तहत दूसरे पुरुष से विवाह करने के लिए बाध्य करना उचित नहीं है। योजनाबद्ध हलाला को अनेक इस्लामी विद्वान भी गलत मानते हैं।

इसलिए हलाला पर चर्चा करते समय यह समझना चाहिए कि धार्मिक नियम की व्याख्या क्या है, उसका दुरुपयोग क्या है और समाज में वास्तव में क्या हो रहा है। किसी प्रथा के नाम पर होने वाले शोषण का बचाव करना भी गलत है और बिना पूरी जानकारी के पूरे धर्म को बदनाम करना भी गलत है।

अब नियोग पर भी चर्चा होनी चाहिए

जब कुछ लोग मुताह पर सवाल उठाते हैं, तो मैं उनसे एक दूसरा सवाल भी पूछना चाहता हूँ। प्राचीन हिंदू धर्मशास्त्रीय साहित्य में नियोग की व्यवस्था का उल्लेख क्यों मिलता है?

मनुस्मृति के नौवें अध्याय के श्लोक 59 से 63 में नियोग से संबंधित चर्चा है। महाभारत में विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद व्यास द्वारा अंबिका और अंबालिका से संतान उत्पन्न करने का प्रसंग भी प्रसिद्ध है। इस ऐतिहासिक और धार्मिक प्रसंग को नकारने के बजाय उसके वास्तविक अर्थ और नैतिक पहलुओं पर चर्चा होनी चाहिए।

नियोग की व्यवस्था में विशेष परिस्थितियों में किसी दूसरे पुरुष से संतान उत्पन्न करने की अनुमति दी जाती थी, जबकि संतान को मृत पति के वंश से जोड़ा जा सकता था। अब मेरा सवाल है: यदि पति-पत्नी का रिश्ता पवित्र है और विवाह में निष्ठा का महत्त्व है, तो संतान प्राप्त करने के लिए तीसरे पुरुष को इस रिश्ते के बीच लाने की आवश्यकता क्यों थी?

आज के दौर में क्या कोई पति अपनी पत्नी से कहेगा कि तुम किसी दूसरे पुरुष के पास जाकर संबंध बनाओ और उससे पैदा होने वाले बच्चे को मैं अपना नाम दूँगा? क्या पत्नी के लिए भी यही व्यवस्था स्वीकार्य होगी कि यदि पति से संतान नहीं हो रही, तो वह किसी दूसरी महिला से संतान पैदा करके उसे अपनी संतान घोषित कर दे? यदि आज के समाज में इस तरह के प्रस्ताव को अधिकांश लोग अपने वैवाहिक रिश्ते के विरुद्ध मानते हैं, तो हमें इस प्रथा के ऐतिहासिक और नैतिक पक्ष पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

मेरा सवाल किसी हिंदू भाई की आस्था पर हमला करना नहीं है। मेरा सवाल उस व्यवस्था से है, जिसे केवल इसलिए सही नहीं माना जा सकता कि उसका उल्लेख किसी प्राचीन ग्रंथ में है।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने मनुस्मृति और जाति-आधारित सामाजिक व्यवस्था की आलोचना की थी। उनके विचारों पर चर्चा करते हुए यह समझना चाहिए कि किसी प्राचीन ग्रंथ की हर बात को आधुनिक समाज में बिना विचार किए लागू करना आवश्यक नहीं है। समानता, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा की कसौटी पर हर व्यवस्था को परखना चाहिए।

यदि नियोग को उस समय की विशेष सामाजिक परिस्थिति से जुड़ी व्यवस्था कहा जाता है, तो यह भी स्वीकार करना होगा कि किसी ग्रंथ में वर्णित हर प्रथा को हर युग में उसी रूप में अपनाना अनिवार्य नहीं माना गया। और यदि कोई कहता है कि वह ईश्वर का अपरिवर्तनीय आदेश था, तो उसे यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि आज उसका पालन किस रूप में और क्यों नहीं किया जाता।

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मेरे विचार में संतान की इच्छा के लिए पति-पत्नी के रिश्ते में तीसरे व्यक्ति को शामिल करने के बजाय अन्य विकल्पों पर विचार करना अधिक उचित है। यदि दोनों पति-पत्नी सहमत हों, तो संतानहीन जीवन स्वीकार करना, गोद लेना या अपने धार्मिक और कानूनी अधिकारों के अनुसार विवाह से जुड़े दूसरे विकल्पों पर विचार करना संभव है। यदि विवाह में मतभेद असहनीय हों, तो अलग होने का रास्ता भी मौजूद है। किसी भी परिस्थिति में स्त्री की इच्छा और सम्मान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए।

इसी कसौटी पर मैं मुताह, हलाला और नियोग सहित हर धार्मिक व्यवस्था पर चर्चा करना चाहता हूँ। किसी व्यवस्था को सिर्फ इसलिए सही नहीं कहा जा सकता कि उसका नाम धर्म से जुड़ा है; उसके नियम, परिस्थितियाँ, सहमति और वास्तविक परिणाम भी देखे जाने चाहिए।

धर्म के नाम पर दोहरा मापदंड क्यों?

मैं उन लोगों से भी सवाल करता हूँ, जो अपने धर्म की हर प्रथा को बिना सवाल किए सही मानते हैं, लेकिन दूसरे धर्म की हर व्यवस्था को गलत बताते हैं। यदि किसी को मुताह पर सवाल करने का अधिकार है, तो दूसरे व्यक्ति को नियोग पर सवाल करने का भी अधिकार है। यदि किसी को हलाला की आलोचना करनी है, तो उसे अपने धार्मिक साहित्य में वर्णित प्रथाओं पर भी ईमानदारी से विचार करना चाहिए।

यही बात मुसलमानों पर भी लागू होती है। किसी मुस्लिम व्यक्ति को हिंदू धर्म की हर बात का मज़ाक उड़ाने का अधिकार नहीं मिल जाता। सवाल करने और अपमान करने के बीच अंतर होता है। तर्क का जवाब तर्क से देना चाहिए, न कि गाली से।

हिंदू और मुस्लिम कट्टरपंथियों से मेरी अपील

मुझे उन मुसलमानों से भी शिकायत है, जो हिंदू भाइयों को केवल उनके धर्म के कारण अपमानित करते हैं या उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। कुरान की सूरह अल-हुजुरात, आयत 13 में बताया गया है कि मानवता को एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया गया और लोगों को अलग-अलग समुदायों में इसलिए बनाया गया कि वे एक-दूसरे को पहचानें। आयत का संदेश यह भी है कि अल्लाह के निकट सम्मान का आधार तक़वा है, न कि जाति या समुदाय का अहंकार।

कुरान की सूरह अल-हुजुरात, आयत 10 में ईमान वालों को भाई कहा गया है। इस आयत का अपना संदर्भ है, लेकिन इसे पढ़ते हुए भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दूसरे मनुष्यों के साथ न्याय, सम्मान और सद्व्यवहार करना धार्मिक नैतिकता का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

किसी धार्मिक शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल करना भी अज्ञानता है। उदाहरण के लिए, ‘काफ़िर’ एक धार्मिक शब्द है, जिसका अर्थ इस्लामी संदर्भ में ईमान या सत्य को न मानने से जुड़ा है। लेकिन किसी हिंदू पड़ोसी, मित्र या सहकर्मी को अपमानित करने के लिए इसका इस्तेमाल करना धार्मिक समझदारी नहीं है। किसी व्यक्ति की आस्था से असहमति होने का अर्थ यह नहीं कि उसके साथ दुर्व्यवहार किया जाए।

इसी तरह, मुसलमानों को भी इतिहास के हर शासक या बादशाह का बिना विचार किए बचाव नहीं करना चाहिए। औरंगज़ेब सहित किसी भी ऐतिहासिक शासक के कार्यों का मूल्यांकन उसके वास्तविक आचरण और ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए। यदि किसी शासक ने अत्याचार किया, निर्दोषों को नुकसान पहुँचाया या अन्याय किया, तो केवल उसके धर्म के आधार पर उसका बचाव नहीं किया जा सकता। न्याय का सिद्धांत सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए।

धर्म से पहले इंसानियत को समझिए

मैं यह लेख किसी धर्म को नीचा दिखाने के लिए नहीं लिख रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग एक-दूसरे के धार्मिक साहित्य को पढ़ें, सवाल करें, तर्क दें और जहाँ गलत बात मिले, वहाँ उसकी आलोचना करें। लेकिन आलोचना का उद्देश्य किसी समुदाय के प्रति नफ़रत फैलाना नहीं, बल्कि समझ बढ़ाना होना चाहिए।

हिंदू मित्रों से मेरी गुज़ारिश है कि इस्लाम पर सवाल कीजिए, लेकिन पूरे इस्लाम को सोशल मीडिया की अधूरी पोस्टों से मत समझिए। मुस्लिम भाइयों से मेरी गुज़ारिश है कि हिंदू धर्म के बारे में बोलने से पहले उसके वास्तविक ग्रंथों और विविध परंपराओं को समझिए। अपने धर्म के प्रश्नों का जवाब पढ़कर दीजिए, गाली देकर नहीं।

लखनऊ की गंगा-जमुनी तहज़ीब केवल एक नारा नहीं थी। वह हमारे जीवन का हिस्सा थी—एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होना, दुख-सुख में साथ खड़े रहना और मतभेदों के बावजूद रिश्तों को बनाए रखना। हमें उस विरासत को फिर से मजबूत करना है।

धर्म कोई भी हो, उसके नाम पर अन्याय, शोषण और नफ़रत का बचाव नहीं होना चाहिए। यदि हम अपने धर्म को सचमुच समझते हैं, तो हमें अपने आचरण में न्याय, ईमानदारी, करुणा और इंसानियत दिखानी चाहिए।

मेरी अपील उन सभी लोगों से है, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान: नफ़रत फैलाने वाली पोस्ट साझा करने से पहले सोचिए, किसी धर्म पर आरोप लगाने से पहले पढ़िए और किसी इंसान को उसके धर्म के कारण अपना दुश्मन मत बनाइए।

सवाल पूछिए, जवाब दीजिए, गलत बात की आलोचना कीजिए लेकिन इंसानियत का दामन मत छोड़िए।

अगर मेरी बात में कोई तथ्यात्मक गलती है, तो उसका जवाब प्रमाण और तर्क से दीजिए। मैं भी सीखने और अपनी बात को सुधारने के लिए तैयार हूँ। लेकिन नफ़रत और गाली-गलौज से न किसी धर्म का सम्मान बढ़ता है, न समाज का भला होता है।

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