सोमवार, 12 अक्टूबर 2026
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लखनऊ की ऐतिहासिक करबला दयानतउद्दौला की मीनार ढही, बड़ा हादसा टला

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लखनऊ की ऐतिहासिक करबला दयानतउद्दौला की मीनार ढही, बड़ा हादसा टला

170 वर्ष पुरानी धार्मिक धरोहर के संरक्षण पर उठे गंभीर सवाल, पुरातत्व विभाग की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करने की मांग

ज़की भारतीय ✍🏼 

लखनऊ। पुराने लखनऊ की ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान से जुड़ी करबला दयानतउद्दौला में एक विशाल मीनार के गिरने की घटना ने ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण, रखरखाव और जिम्मेदार विभागों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों और शिया समुदाय से जुड़े लोगों के अनुसार, करबला परिसर में स्थित एक मीनार पिछले लगभग 12 से 20 वर्षों से धीरे-धीरे झुक रही थी। समय रहते उसकी समुचित मरम्मत और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए होते, तो शायद इस घटना को रोका जा सकता था।

गनीमत यह रही कि मीनार जब गिरी तो उस समय परिसर में कोई जायरीन, बच्चा या अन्य व्यक्ति मौजूद नहीं था। यदि यह घटना उस समय होती, जब धार्मिक स्थल पर लोगों की आवाजाही रहती है, तो जान-माल का बड़ा नुकसान हो सकता था। मीनार गिरने की तेज आवाज से आसपास के लोगों में दहशत फैल गई। बताया जा रहा है कि मीनार के गिरने से करबला परिसर के अन्य हिस्सों और कई इमारत को भी नुकसान पहुंचा।

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यह घटना केवल एक मीनार के गिरने का मामला नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा के प्रति बरती जाने वाली कथित लापरवाही की जांच का विषय भी है।

लखनऊ की ऐतिहासिक करबला दयानतउद्दौला की मीनार ढही, बड़ा हादसा टला

1851–1852 में हुआ था ऐतिहासिक करबला का निर्माण

करबला दयानतउद्दौला लखनऊ की उन ऐतिहासिक इमारतों में शामिल है, जिनका संबंध अवध के नवाबी दौर और शिया धार्मिक परंपराओं से है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इसका निर्माण लगभग 1851–1852 ईस्वी में नवाब वाजिद अली शाह के शासनकाल में कराया गया था। इसे बनवाने वाले मोहम्मद हुसैन अली को दयानतउद्दौला की उपाधि प्राप्त थी और वे शाही दरबार से जुड़े प्रभावशाली व्यक्ति थे।

इतिहासकारों के अनुसार, इस इमारत का निर्माण इराक स्थित करबला की धार्मिक स्मृतियों और स्थापत्य से प्रेरित होकर कराया गया था। परिसर में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की याद से जुड़ा रोजा, धार्मिक आयोजनों के स्थान और अन्य स्थापत्य संरचनाएं हैं। यह शिया समुदाय के लिए केवल पुरानी इमारत नहीं, बल्कि अकीदत, अजादारी और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है।

इस परिसर का ऐतिहासिक महत्व इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि मई 1854 में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रोजे की प्रतिकृति से संबंधित एक ऐतिहासिक जुलूस यहां पहुंचा था, जिसमें नवाब वाजिद अली शाह और उनके दरबार के लोग शामिल हुए थे। इस घटना का उल्लेख इतिहास संबंधी प्रकाशित विवरणों में मिलता है।

इस प्रकार लगभग 170 वर्ष पुरानी यह इमारत लखनऊ की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का हिस्सा है। इसके संरक्षण में किसी भी तरह की लापरवाही को सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

वर्षों से झुक रही थी मीनार, क्या समय रहते कार्रवाई हुई?

स्थानीय लोगों के मुताबिक, करबला के मुख्य प्रवेश द्वार से अंदर जाने पर बाईं ओर मस्जिद के निकट स्थित मीनार का झुकाव वर्षों से बढ़ रहा था। यह मीनार काफी ऊंची थी और स्थानीय अनुमान के अनुसार इसकी ऊंचाई लगभग 100 फीट से भी अधिक थी। हालांकि इसकी वास्तविक ऊंचाई का आधिकारिक माप उपलब्ध कराना आवश्यक है।

बताया जाता है कि मीनार का झुकाव धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था और आसपास के लोगों को उसकी स्थिति को लेकर चिंता थी। इस संबंध में शिया समुदाय की ओर से संबंधित अधिकारियों को समय-समय पर लिखित रूप से अवगत कराए जाने की बात भी सामने आई है।

यदि इन शिकायतों और आवेदनों का रिकॉर्ड उपलब्ध है, तो यह जांच का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है। संबंधित विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि उसे मीनार की खराब स्थिति की जानकारी कब मिली, कितनी बार निरीक्षण किया गया, क्या तकनीकी रिपोर्ट तैयार हुई और मरम्मत के लिए क्या कदम उठाए गए।

स्थानीय पक्ष का आरोप है कि मरम्मत की पहल होने और काम शुरू किए जाने की चर्चाओं के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका। अब आवश्यक है कि इस पूरे घटनाक्रम की तारीखवार जांच की जाए और संबंधित पत्राचार तथा विभागीय फाइलों को सार्वजनिक किया जाए।

पुरातत्व विभाग की जिम्मेदारी क्या बनती है?

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि करबला का संबंधित हिस्सा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अथवा किसी अन्य सक्षम संरक्षण प्राधिकरण के संरक्षण और नियंत्रण में है, तो उसकी संरचनात्मक सुरक्षा और रखरखाव की जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी?

किसी ऐतिहासिक इमारत को संरक्षित स्मारक घोषित करना केवल उसके ऐतिहासिक महत्व को मान्यता देना नहीं है। संरक्षण का उद्देश्य उसकी संरचना को सुरक्षित रखना, समय-समय पर निरीक्षण करना, क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत करना और संभावित दुर्घटनाओं को रोकना भी है। हालांकि किसी विशेष परिसर में वास्तविक कानूनी जिम्मेदारी इस बात पर निर्भर करेगी कि वह किस विभाग के अधीन है, संरक्षण अधिसूचना में क्या प्रावधान हैं और संबंधित हिस्से का रखरखाव किसे सौंपा गया है।

इसीलिए संबंधित अधिकारियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि करबला दयानतउद्दौला के इस हिस्से की देखरेख किसके पास थी। यदि पुरातत्व विभाग के पास इसकी जिम्मेदारी थी और उसे मीनार के खतरनाक ढंग से झुकने की सूचना पहले से प्राप्त थी, तो यह जांचना आवश्यक है कि प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

यदि जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही प्रमाणित होती है, तो उनके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। इसके साथ ही मीनार गिरने के तकनीकी कारणों की स्वतंत्र जांच भी कराई जानी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि घटना संरचनात्मक कमजोरी, नींव की समस्या, मौसम के प्रभाव, रखरखाव में कमी या अन्य किसी कारण से हुई।

धार्मिक धरोहरों की मरम्मत में बाधाएं क्यों?

शिया समुदाय से जुड़े कुछ संगठनों का आरोप है कि ऐतिहासिक धार्मिक इमारतों की मरम्मत के लिए समुदाय के लोगों को स्वयं पहल करने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उनका कहना है कि यदि कोई व्यक्ति या संगठन अपने स्तर पर निर्माण अथवा मरम्मत का प्रयास करता है, तो कई बार संबंधित अधिकारियों की अनुमति, आपत्तियों या पुलिस कार्रवाई की आशंका के कारण काम आगे नहीं बढ़ पाता।

यह समझना जरूरी है कि किसी संरक्षित स्मारक पर मनमाने ढंग से निर्माण या मरम्मत कराना उचित नहीं है। ऐतिहासिक इमारतों में गलत तरीके से किया गया निर्माण उनकी मूल संरचना को और नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि जरूरी मरम्मत वर्षों तक लंबित रहे और इमारत दुर्घटना के खतरे में बनी रहे।

यदि विभाग स्वयं मरम्मत करने में सक्षम नहीं है, तो उसे विशेषज्ञों की मदद लेनी चाहिए और काम समयबद्ध तरीके से पूरा कराना चाहिए। जहां कानून अनुमति देता हो, वहां धार्मिक संस्था या समुदाय के प्रतिनिधियों को विशेषज्ञों के साथ संरक्षण कार्य में शामिल करने की व्यवस्था भी बनाई जा सकती है।

रोजा काजमैन सहित अन्य इमारतों की सुरक्षा भी जरूरी

इस घटना के बाद केवल करबला दयानतउद्दौला ही नहीं, बल्कि लखनऊ की दूसरी ऐतिहासिक धार्मिक इमारतों की सुरक्षा पर भी ध्यान देना आवश्यक है। शिया समुदाय से जुड़े लोगों ने रौजा ए काजमैन सहित अन्य पुराने धार्मिक स्थलों की जर्जर स्थिति को लेकर चिंता जताई है। उनके अनुसार, कुछ इमारतों की दीवारों, मीनारों और अन्य हिस्सों की हालत कमजोर है तथा उनकी मरम्मत की आवश्यकता है।

यदि किसी ऐतिहासिक स्थल पर पहले से दरारें हैं, मीनार झुक रही है या छत और दीवारें कमजोर हैं, तो दुर्घटना होने की प्रतीक्षा करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। संबंधित विभागों को सभी संवेदनशील इमारतों का संरचनात्मक सर्वेक्षण कराना चाहिए और खतरे के स्तर के अनुसार मरम्मत की प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए।

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विशेष रूप से उन धार्मिक स्थलों पर तत्काल ध्यान दिया जाना चाहिए, जहां मुहर्रम, मजलिस, जुलूस या अन्य अवसरों पर बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। सुरक्षा के लिए आवश्यक होने पर प्रभावित हिस्से को अस्थायी रूप से खाली कराना, प्रवेश सीमित करना और सुरक्षित रास्ते बनाना भी जरूरी है।

शिया संगठनों की मांग: जवाबदेही तय हो, धरोहर सुरक्षित रहे

करबला की मीनार गिरने की घटना के बाद शिया समुदाय के संगठनों और धार्मिक प्रतिनिधियों की ओर से नाराजगी जताए जाने की बात सामने आई है। उनकी मांग है कि जिम्मेदार विभाग अपनी जवाबदेही से पीछे न हटें और ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों की सुरक्षा को प्राथमिकता दें।

कुछ संगठनों का यह भी कहना है कि यदि संबंधित विभाग इन इमारतों का समुचित रखरखाव करने में सक्षम नहीं हैं, तो कानूनी प्रक्रिया के तहत उनकी देखरेख में समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। कुछ प्रतिनिधियों ने यह मांग भी उठाई है कि संबंधित संपत्तियों का प्रबंधन शिया समुदाय या उसकी अधिकृत संस्थाओं को सौंपने की संभावना पर विचार किया जाए।

हालांकि संरक्षित स्मारकों का नियंत्रण किसी समुदाय को सौंपना अपने आप में कानूनी अधिकार नहीं है। इसके लिए संपत्ति के स्वामित्व, संरक्षण अधिसूचना और लागू कानूनों को देखना होगा। फिर भी समुदाय की यह मांग कि उसकी धार्मिक विरासत की सुरक्षा में उसकी आवाज सुनी जाए, संबंधित अधिकारियों के विचार के योग्य है।

धार्मिक स्थलों का संरक्षण किसी समुदाय के अकीदे और भावनाओं से जुड़ा विषय है। इसलिए अधिकारियों को समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए, शिकायतों का लिखित जवाब देना चाहिए और संरक्षण कार्य की स्थिति से अवगत कराना चाहिए।

करबला दयानतउद्दौला की मीनार गिरने की घटना के मद्देनजर प्रशासन और संबंधित विभागों को कई ठोस कदम उठाने चाहिए हैं।इनमें स्वतंत्र तकनीकी जांच,मीनार गिरने के कारणों की जांच विशेषज्ञ इंजीनियरों और संरक्षण विशेषज्ञों से कराई जाए तथा रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।

मीनार की स्थिति की जानकारी मिलने, निरीक्षण, मरम्मत के प्रस्ताव और कार्रवाई में हुई देरी का रिकॉर्ड जांचा जाए। लापरवाही प्रमाणित होने पर जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई हो।

करबला दयानतउद्दौला के रोजे, मस्जिद, शेष मीनारों, दीवारों और अन्य भवनों की सुरक्षा जांच कराई जाए। जरूरत पड़ने पर अन्य संवेदनशील धार्मिक स्थलों का भी सर्वेक्षण हो।

जिन इमारतों की मरम्मत के लिए पहले से आवेदन दिए गए हैं, उनकी स्थिति स्पष्ट की जाए और जरूरी कार्य के लिए समयसीमा निर्धारित की जाए।

शिया संगठनों और धार्मिक प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर शिकायतों, मरम्मत की योजनाओं और भविष्य की देखरेख की व्यवस्था पर पारदर्शी निर्णय लिया जाए।

हादसा टला है, लेकिन सवाल अभी बाकी हैं

करबला दयानतउद्दौला की मीनार गिरने से यदि कोई जनहानि नहीं हुई, तो यह राहत की बात है। लेकिन केवल इसलिए कि किसी की जान नहीं गई, इस घटना को मामूली नहीं माना जा सकता। एक ऐतिहासिक मीनार का गिरना अपने आप में गंभीर चेतावनी है, विशेषकर तब जब उसके वर्षों से झुकने की शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही हो।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संबंधित विभाग को समय रहते खतरे की जानकारी थी? यदि थी, तो उसने क्या कदम उठाए? मरम्मत में देरी हुई तो क्यों? और क्या लखनऊ की दूसरी ऐतिहासिक धार्मिक इमारतों को भी इसी तरह किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार करना पड़ रहा है?

इन सवालों के जवाब केवल बयान जारी करने से नहीं मिलेंगे। इसके लिए दस्तावेजों, तकनीकी जांच, विभागीय रिकॉर्ड और जवाबदेही तय करने की जरूरत है।

ऐतिहासिक धरोहरें किसी एक विभाग की फाइलों में दर्ज संपत्ति मात्र नहीं होतीं। वे शहर की तारीख, लोगों की धार्मिक भावनाओं और आने वाली नस्लों की विरासत होती हैं। करबला दयानतउद्दौला के मामले में जरूरी है कि सच्चाई सामने आए, जिम्मेदारी तय हो और बाकी इमारतों को सुरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

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