गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026
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ज़ैनबिया बारगाह मुम्बई में हुआ “बयाज़ ए अज़ीम” का विमोचन

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ज़ैनबिया बारगाह मुम्बई में हुआ “बयाज़ ए अज़ीम” का विमोचन

मुंबई के भिंडी बाज़ार में स्थित ऐतिहासिक ज़ैनबिया इमामबारगाह में गत दिनों “जश्न-ए-गुंचा-हाए-गुलिस्तान-ए- तत्हीर ” के आयोजन में हुआ। इस अवसर पर शायर-ए-अहलेबैत अज़ीम आज़मी की नवीनतम नोहा संग्रह “बयाज़ ए अज़ीम” का रस्मे इज़रा यानी विमोचन बड़ी शान से संपन्न हुआ। कार्यक्रम अंजुमन मशके सकीना द्वारा ऑल इंडिया कवि संगोष्ठी के रूप में आयोजित किया गया था, जिसमें हिंदुस्तान के विभिन्न शहरों से शिया धर्मगुरु, शायर-ए-अहलेबैत और साहित्य प्रेमी बड़ी संख्या में शामिल हुए।

इस खास मौके पर शायर-ए-अहलेबैत फराज़ वास्ती, बिलाल काज़मी, ज़की भारतीय सहित मुंबई, लखनऊ, हैदराबाद और अन्य शहरों के कई जाने-माने कवि, आलिम और बुद्धिजीवी उपस्थित थे। मंच से किताब की अनोखी विशेषताओं पर गहन चर्चा हुई और इसे उर्दू शायरी तथा अहलेबैत की मार्मिक यादों को संजोने वाली एक अनमोल कृति बताया गया।

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ज़ैनबिया बारगाह मुम्बई में हुआ “बयाज़ ए अज़ीम” का विमोचन“बयाज़ ए अज़ीम” उर्दू साहित्य की दुनिया में एक मील का पत्थर साबित हो रही है। यह किताब अपनी तरह की पहली ऐसी बयाज़ है जिसमें एक ही शायर अज़ीम आज़मी ने अहलेबैत अलैहिस्सलाम के हर एक फर्द (इमाम हुसैन, बीबी ज़ैनब, हज़रत अब्बास, हज़रत अली अकबर, हज़रत अली असगर और अन्य सभी) की शहादत और गम के अलग-अलग सिलसिले में तारीखवार नोहे लिखे हैं। अब तक जो भी नोहा संग्रह आए हैं, उनमें ज्यादातर अलग-अलग शायरों के नोहे इकट्ठे रहते हैं। लेकिन अहलेबैत के पूरे खानदान के गम को एक ही शायर की संवेदनशील कलम से इस तरह बयान करना न केवल नया है, बल्कि बहुत गहरा और प्रभावशाली भी है।

नोहा शिया परंपरा की सबसे मार्मिक और दिल को छू लेने वाली शायरी विधा है। इसका शाब्दिक अर्थ है विलाप, रोना-धोना या शोक गान। नोहा कर्बला के मैदान में हुए जुल्म, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत, उनके परिवार की बेबसी, प्यास, तन्हाई, बलिदान और धैर्य का इतना गहरा चित्रण करता है कि सुनने वाला खुद को उस दर्द में शामिल महसूस करने लगता है। नोहे में सोज़-ए-ग़म की वह आग होती है जो दिल को झुलसा देती है। इसमें दर्द, ग़म, सलाम, मातम, बेबसी, इंसाफ की पुकार, ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ और इमाम हुसैन के बलिदान की यादें एक साथ समाई होती हैं।

जब कोई नोहा पढ़ा या सुना जाता है तो श्रद्धालु का सीना फटने लगता है, आंखों से आंसू बहने लगते हैं और वह मातम में पूरी तरह डूब जाता है। यही नोहे की असली ताकत है – यह सिर्फ़ शब्द नहीं, बल्कि एक भावनात्मक पुल है जो सुनने वाले को कर्बला के मैदान तक ले जाता है। नोहे में भाषा की मिठास, वज़न की पाबंदी, काफिया की बारीकियां और सबसे ऊपर सच्चा सोज़-ए-दिल होता है। यही वजह है कि नोहे सुनकर लोग घंटों तक रोते रहते हैं और इमाम हुसैन के दर्द को अपने दिल में महसूस करते हैं।

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ज़ैनबिया बारगाह मुम्बई में हुआ “बयाज़ ए अज़ीम” का विमोचनअज़ीम आज़मी ने “बयाज़ ए अज़ीम” में नोहे की इन सभी खूबियों को पूरा न्याय दिया है। उनके नोहे सरल शब्दों में लिखे गए हैं, लेकिन उनमें वह गहराई और सोज़ है जो सीधे दिल तक उतर जाता है। हर नोहा अलग-अलग फर्ज़ के गम को अलग-अलग अंदाज़ में बयान करता है – कभी बीबी ज़ैनब की बेबसी, कभी हज़रत अब्बास की वफादारी, कभी हज़रत अली अकबर की जवान शहादत, कभी हज़रत अली असगर की प्यास। यह किताब पूरे साल मुहर्रम के अलावा भी अहलेबैत के गम के मौकों पर पढ़ी जा सकती है।

किताब की सबसे बड़ी और क्रांतिकारी खासियत यह है कि हर नोहे के नीचे यूट्यूब का लिंक दिया गया है। इस लिंक को खोलते ही नोहे की असली तर्ज़ (धुन) सुनाई देती है। पहले ज्यादातर नोहा किताबों में सिर्फ़ लफ्ज़ होते थे, धुन लोगों को पता नहीं चलती थी, इसलिए बहुत से नोहे सिर्फ़ किताबों तक सीमित रह जाते थे। लेकिन अज़ीम आज़मी ने इस कमी को दूर कर दिया। अब कोई भी श्रद्धालु घर बैठे नोहे की धुन के साथ पढ़ या सुन सकता है, जिससे मातम और सोज़ का असर कई गुना बढ़ जाता है।

विमोचन के बाद से ही किताब की मांग हिंदुस्तान भर में तेज़ हो गई है। मुंबई के अलावा लखनऊ की अब्बास बुक एजेंसी, अल-गदीर बुक एजेंसी, दिल्ली, हैदराबाद, पटना और अन्य शहरों के इस्लामिक बुक डिपो में यह तेज़ी से बिक रही है। लोग इसे खरीदकर इस्तेमाल कर रहे हैं।

अज़ीम आज़मी, जो मूल रूप से आज़मगढ़ के हैं लेकिन बचपन से मुंबई में रहते आए हैं, ने उर्दू साहित्य और अहलेबैत की शायरी के लिए एक ऐसा काम किया है जो आने वाली कई नस्लों तक याद रहेगा। उनकी यह किताब न सिर्फ़ धार्मिक महत्व की है, बल्कि उर्दू शायरी के शिल्प, सुखन और भावुकता में भी अपना अलग मुकाम रखती है। इसमें नोहे के लिए धुन के लिंक हैं। इसलिए यह किताब नई पीढ़ी के लिए अहलेबैत के दर्द, बलिदान और इंसाफ की मिसाल को समझने और महसूस करने का सबसे आसान और प्रभावी ज़रिया बन गई है। आने वाले वक्त में “बयाज़ ए अज़ीम” निश्चित रूप से बहुत मशहूर और मकबूल होगी।

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