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छात्रों को झूठे मुकदमों में फंसाने के दबाव में DCP के इस्तीफे का दावा निकला फर्जी, AI से बनाया गया था वायरल वीडियो
लखनऊ, 6 अक्टूबर।
सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें दिल्ली पुलिस के एक DCP को यह कहते हुए दिखाया जा रहा है कि उन्हें जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ झूठे आरोप लगाने और उन्हें अपराधी साबित करने के लिए दबाव दिया जा रहा था। वीडियो में कथित तौर पर अधिकारी यह भी कहते दिखाई देते हैं कि वह अपनी अंतरात्मा के खिलाफ जाकर काम नहीं कर सकते और इसलिए पुलिस सेवा से इस्तीफा दे रहे हैं। वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय पर गंभीर सवाल उठाए जाने लगे तथा इसे छात्रों के आंदोलन के समर्थन में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के साहसिक कदम के रूप में प्रचारित किया गया।
हालांकि, इस वायरल दावे की पड़ताल करने पर इसकी तस्वीर बिल्कुल अलग सामने आती है। फैक्ट-चेक रिपोर्टों के अनुसार वायरल वीडियो वास्तविक नहीं है। इसमें दिल्ली पुलिस के DCP सुमित झा के पुराने वास्तविक वीडियो के साथ AI द्वारा तैयार की गई आवाज जोड़ी गई है। दिल्ली पुलिस ने स्वयं 26 जुलाई को स्पष्ट किया था कि DCP सुमित झा के इस्तीफे का दावा करने वाला वायरल वीडियो पूरी तरह फर्जी और AI-generated है। पुलिस ने लोगों से एडिट किए गए वीडियो को आगे प्रसारित न करने की अपील भी की थी।
जांच में यह भी सामने आया कि वायरल वीडियो में इस्तेमाल किए गए दृश्य वास्तव में सुमित झा के 23 जुलाई 2026 के उस वीडियो से लिए गए थे, जिसे दिल्ली पुलिस ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर जारी किया था। उस वास्तविक वीडियो में DCP सुमित झा जंतर-मंतर के छात्र प्रदर्शन के संदर्भ में कथित तौर पर सक्रिय गलत सूचना फैलाने वाले पाकिस्तान-आधारित सोशल मीडिया हैंडल्स को लेकर लोगों और छात्रों को सावधान करते दिखाई देते हैं। दिल्ली पुलिस के अनुसार ऐसे 480 हैंडल्स की पहचान कर कार्रवाई की गई थी।
स्वतंत्र फैक्ट-चेक संस्था BOOM ने भी वायरल वीडियो की जांच की और पाया कि वीडियो की आवाज तथा अधिकारी के होंठों की गतिविधियों में असंगति है। जांच में इसे AI-आधारित हेरफेर से तैयार किए जाने के संकेत मिले। संस्था को DCP सुमित झा के इस्तीफे की पुष्टि करने वाली कोई विश्वसनीय खबर भी नहीं मिली। वहीं AFP Fact Check ने भी वायरल दावे को गलत बताते हुए कहा कि वीडियो में ऑडियो को बदलकर ऐसा प्रस्तुत किया गया कि अधिकारी छात्रों को फंसाने के सरकारी दबाव का विरोध करते हुए इस्तीफा दे रहे हैं।
यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि देश में छात्र आंदोलनों, पुलिस कार्रवाई और सरकार से जुड़े मुद्दों को लेकर सोशल मीडिया पर पहले से ही तीखी राजनीतिक बहस चल रही है। ऐसे में किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के नाम और चेहरे का इस्तेमाल कर AI से तैयार वीडियो को वास्तविक बताकर प्रसारित करना जनता को भ्रमित कर सकता है। इससे न केवल संबंधित अधिकारी की छवि प्रभावित होती है, बल्कि किसी सरकार या राजनीतिक दल के खिलाफ भी ऐसे आरोप स्थापित करने की कोशिश होती है, जिनका आधार वास्तविक घटना नहीं बल्कि कृत्रिम रूप से तैयार सामग्री होती है।
लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध, अपनी बात रखने और सरकार से सवाल पूछने के अधिकार पर बहस पूरी तरह जायज है। जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों और पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी स्वतंत्र रूप से सवाल उठाए जा सकते हैं और सरकार की नीतियों की आलोचना की जा सकती है। लेकिन किसी अधिकारी के नाम से ऐसी बात जोड़ देना, जो उसने कही ही नहीं, पत्रकारिता और लोकतांत्रिक बहस दोनों के लिए नुकसानदेह है।
इस मामले में उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इतना स्पष्ट है कि DCP सुमित झा ने छात्रों के समर्थन में इस्तीफा नहीं दिया है और वायरल वीडियो में सुनाई दे रही कथित स्वीकारोक्ति उनकी वास्तविक बयानबाजी नहीं है। इसलिए सोशल मीडिया पर इस वीडियो के आधार पर केंद्र सरकार, गृह मंत्री या पुलिस व्यवस्था के खिलाफ लगाए जा रहे निष्कर्षों को तथ्य नहीं बल्कि एक फर्जी AI वीडियो पर आधारित दावा माना जाना चाहिए
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