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वोटर लिस्ट पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर उठे सवाल, अदालत ने मांगा रिकॉर्ड; अगर कानून टूटा तो फैसले होंगे रद्द!

ज़की भारतीय ✍🏼

लखनऊ, 5 अक्टूबर। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर उठे सवालों से शुरू हुई बहस अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली तक पहुंच गई है। मतदाता सूची से लाखों नाम हटाए जाने, आपत्तियों और अपीलों के समय पर निपटारे तथा निर्वाचन आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिका पर निर्वाचन आयोग, केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। हालांकि अदालत ने ज्ञानेश कुमार को तत्काल निलंबित करने का कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया है, लेकिन सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट कर दिया कि यदि रिकॉर्ड से यह साबित हुआ कि कोई निर्णय कानून के मुताबिक नहीं लिया गया था तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं और संबंधित निर्णय को रद्द भी किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में आरोप लगाया गया है कि निर्वाचन आयोग के तीन सदस्यीय ढांचे में महत्वपूर्ण निर्णय सभी सदस्यों की सहमति अथवा कानून के अनुसार बहुमत के आधार पर लिए जाने चाहिए, लेकिन एसआईआर से जुड़े कुछ निर्णयों और दिशा- निर्देशों को लेकर आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के स्तर से ऐसे कदम उठाए गए जिन पर दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति नहीं थी। एक रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब दस महीनों में कम से कम 14 मौकों पर एसआईआर से जुड़े आदेशों और निर्देशों पर आपत्ति दर्ज की थी। निर्वाचन आयोग ने हालांकि इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है और उसका कहना है कि अलग-अलग विचार और टिप्पणियां संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं तथा आयोग के सभी आदेश कानूनी प्रक्रिया के अनुसार जारी किए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में फॉर्म-6 का मामला भी बेहद महत्वपूर्ण बनकर सामने आया। फॉर्म-6 वह वैधानिक प्रपत्र है जिसके माध्यम से पात्र नागरिक मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 में किए गए किसी संशोधन को मंजूरी नहीं दी थी। अदालत ने यह जानने की इच्छा जताई कि आखिर फॉर्म-6 में बदलाव किसने किया और उसके लिए किस स्तर पर अनुमति ली गई। अदालत ने निर्वाचन आयोग से संबंधित रिकॉर्ड और निर्णय प्रक्रिया का विवरण मांगा है।

यही वह बिंदु है जिसने पूरे विवाद को और गंभीर बना दिया है। यदि किसी संवैधानिक संस्था के महत्वपूर्ण निर्णय में कानून के अनुसार सामूहिक निर्णय की आवश्यकता थी और उसके बावजूद कोई फैसला एकतरफा तरीके से लिया गया, तो यह केवल प्रशासनिक विवाद नहीं रहेगा, बल्कि उस फैसले की वैधानिकता का सवाल बन जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी कारण रिकॉर्ड देखने की जरूरत बताई है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि केवल अखबारों में प्रकाशित खबरों के आधार पर वह किसी अधिकारी को निलंबित करने का आदेश नहीं दे सकती; पहले वास्तविक रिकॉर्ड सामने आना जरूरी है।

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में पश्चिम बंगाल का एसआईआर मामला भी महत्वपूर्ण है। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान लगभग 27.16 लाख नाम हटाए गए थे। निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इनमें से 22.21 लाख लोगों ने अपने नाम दोबारा शामिल कराने के लिए अपील की। कुल मिलाकर 38.31 लाख अपीलें दाखिल हुईं, जिनमें 22.21 लाख नाम शामिल करने और 16.10 लाख नाम हटाने से संबंधित थीं। इसलिए यह कहना कि पश्चिम बंगाल में 40 लाख मतदाताओं के नाम काट दिए गए, आंकड़ों की दृष्टि से सही नहीं होगा। सही तथ्य यह है कि लगभग 27.16 लाख नाम हटाए गए थे और कुल अपीलों की संख्या 38.31 लाख थी।

सबसे बड़ा सवाल इस बात को लेकर उठा कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए, उनकी अपीलों का निपटारा मतदान से पहले कितनी तेजी से हुआ। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार विधानसभा चुनाव से पहले केवल 1,607 मतदाताओं के नाम ही समय रहते बहाल हो पाए। इसका अर्थ यह हुआ कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग थे जिन्होंने अपने नाम वापस मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए प्रक्रिया अपनाई, लेकिन उनका मामला मतदान से पहले अंतिम रूप से निपट नहीं सका।

यहीं से वह सवाल पैदा होता है जिसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि कोई व्यक्ति वास्तव में पात्र मतदाता है और उसका नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाता है, लेकिन उसकी अपील का फैसला मतदान के बाद होता है, तो बाद में नाम बहाल होने से वह उस चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल कैसे करेगा? चुनाव के बाद रिकॉर्ड में उसका नाम वापस जोड़ देना एक प्रशासनिक सुधार हो सकता है, लेकिन जिस दिन मतदान हुआ उस दिन उससे छिना हुआ मत वापस नहीं आ सकता। यही कारण है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में केवल नाम हटाने की प्रक्रिया ही नहीं बल्कि समयबद्ध सुनवाई और मतदान से पहले अपील के निपटारे की व्यवस्था भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

बिहार का उदाहरण भी इस बहस को और गंभीर बनाता है। वर्ष 2025 में बिहार के एसआईआर के दौरान लगभग 65 लाख नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर किए गए थे। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को इन नामों की सूची और नाम हटाने के कारण सार्वजनिक करने का निर्देश दिया था। अदालत ने यह भी माना था कि मतदाता सूची से नाम बाहर होने का नागरिक के मताधिकार पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है और इसलिए निष्पक्ष प्रक्रिया आवश्यक है।

बिहार की अंतिम मतदाता सूची में कुल मिलाकर लगभग 68.5 लाख नाम हटे, जबकि 21.53 लाख नए मतदाता जोड़े गए। अंतिम सूची में मतदाताओं की संख्या 7.89 करोड़ से घटकर करीब 7.42 करोड़ रह गई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार हटाए गए नामों का बड़ा हिस्सा मृत्यु, स्थायी रूप से स्थानांतरित होने या दोहरी प्रविष्टि जैसे कारणों से जुड़ा था। इसलिए हर हटाए गए नाम को गलत या फर्जी तरीके से हटाया गया बताना भी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर पुनरीक्षण होने की स्थिति में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि एक भी पात्र नागरिक केवल प्रशासनिक या दस्तावेजी प्रक्रिया की वजह से अपने मताधिकार से वंचित न हो।

यही कारण है कि अब सुप्रीम कोर्ट में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उठे सवालों को केवल किसी एक राजनीतिक दल की शिकायत मानकर समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत के सामने असली प्रश्न यह है कि निर्वाचन आयोग जैसे संवैधानिक निकाय के भीतर निर्णय किस प्रक्रिया से लिए गए। क्या सभी जरूरी फैसले आयोग के निर्धारित कानूनी ढांचे के अनुसार हुए? क्या दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों को फैसलों की जानकारी थी? क्या उनकी आपत्तियों पर विचार किया गया? क्या फॉर्म-6 में बदलाव के लिए विधि सम्मत अनुमति ली गई? और यदि किसी फैसले में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ तो क्या उस फैसले को लागू किया जा सकता है?

इन सवालों का जवाब अब राजनीतिक मंचों से नहीं बल्कि निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड, फाइल नोटिंग, बैठक के विवरण और संबंधित दस्तावेजों से सामने आना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए रिकॉर्ड मांगा है। अदालत ने फिलहाल ज्ञानेश कुमार को निलंबित नहीं किया है और न ही यह घोषित किया है कि निर्वाचन आयोग के सभी विवादित फैसले अवैध हैं। इसलिए इस समय यह कहना कि सुप्रीम कोर्ट ने सभी फैसले रद्द कर दिए हैं, गलत होगा। सही स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों को गंभीरता से सुनते हुए संबंधित पक्षों से जवाब और रिकॉर्ड मांगा है तथा कानून के उल्लंघन की स्थिति में निर्णयों पर कार्रवाई की संभावना खुली रखी है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि मतदाता सूची में लाखों नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर पहले से आशंकाएं थीं, यदि राजनीतिक दल लगातार आपत्तियां दर्ज करा रहे थे और यदि स्वयं निर्वाचन आयोग के भीतर भी कुछ निर्णयों को लेकर असहमति दर्ज होने की खबरें सामने आईं, तो इन मामलों की पूरी जांच और स्पष्टीकरण चुनाव से पहले क्यों नहीं कराया गया? लोकतंत्र में चुनाव केवल मतदान कराने का नाम नहीं है। मतदाता सूची की शुद्धता, पात्र मतदाता का नाम सुरक्षित रहना, नाम हटाने पर सुनवाई का अधिकार और मतदान से पहले शिकायत का निपटारा भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

यदि सुप्रीम कोर्ट की जांच में यह साबित होता है कि निर्वाचन आयोग के किसी निर्णय को कानून के अनुसार आवश्यक बहुमत या वैधानिक प्रक्रिया के बिना लागू किया गया था, तो उस निर्णय को रद्द किया जाना चाहिए और जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि किसी अधिकारी ने जानबूझकर कानून की अनदेखी की हो तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की मांग भी स्वाभाविक है। इसी तरह यदि किसी चुनाव क्षेत्र में मतदाता सूची में हुई गड़बड़ी का चुनाव परिणाम पर वास्तविक और निर्णायक प्रभाव साबित होता है, तो संबंधित चुनाव परिणाम को चुनौती देने के लिए कानून में उपलब्ध न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।कांग्रेस, विपक्षी दलों और अन्य राजनीतिक संगठनों की ओर से मतदाता सूची और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग अपने फैसलों को कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप बता रहा है। ऐसे में लोकतंत्र के हित में सबसे बेहतर रास्ता यही है कि आरोपों और प्रत्यारोपों से आगे बढ़कर पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच के सामने आए। सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा सुनवाई इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। क्योंकि चुनाव में किसी पार्टी की जीत या हार से भी पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि मतदाता सूची में जिसका नाम होना चाहिए, उसका नाम मौजूद हो और जिसे वोट देने का अधिकार है, उसे मतदान के दिन अपने मताधिकार से वंचित न होना पड़े।

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