लखनऊ, 27 अक्टूबर। मशहूर व मारूफ़ शायर जनाब शान लखनवी साहब ने लखनऊ में नौहा-ख़्वानी की उस पुरानी परंपरा को फिर से ज़िंदा करने की पहल की है, जिसकी कमी लंबे समय से अज़ादारों को महसूस हो रही थी। उनकी ओर से हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की शहादत के सिलसिले में नौहे की ‘तरही शब-बेदारी’ का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें दस अंजुमनें हिस्सा लेंगी। इस कार्यक्रम का उद्देश्य नौहा-ख़्वानी को फिर से अज़ादारी के केंद्र में लाना और लोगों को नौहे सुनने के लिए उसी तरह एकत्र करना है, जैसे पहले लखनऊ में हुआ करता था।
दरअसल, लगभग 50 वर्ष पीछे जाएं तो लखनऊ की अज़ादारी में नौहा-ख़्वानी का अपना एक अलग अंदाज़ हुआ करता था। अंजुमनों के मुसद्दस और मशहूर नौहे सुनने के लिए अज़ादार देर तक खड़े रहते थे। नौहा शुरू होता तो लोग उसे ध्यान से सुनते, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और शोहदाए करबला की याद में गिरया करते थे। लेकिन धीरे-धीरे माहौल बदला। सलाम और दूसरे कलाम सुनने के लिए अंजुमनों में सैकड़ों लोगों का मजमा तो जुटने लगा, मगर नौहा शुरू होते ही लोगों के उठकर चले जाने की शिकायत भी सामने आने लगी।
यह अपने आप में विचार करने वाली बात है कि जो अज़ादार इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और अहलेबैत के ग़म में मातम करते हैं, क़मा-ज़नी और ज़ंजीर-ज़नी करते हैं, दिनभर सड़कों पर अज़ादारी का फ़र्ज़ निभाते हैं और रातभर जागते हैं, उनमें से कुछ लोग नौहा शुरू होने पर ही नौहा सुने बिना चले जाते हैं। जबकि नौहा-ख़्वानी करबला के दर्दनाक वाक़िआत को याद करने और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मज़लूमियत पर आंसू बहाने का अहम ज़रिया है।
जनाब शान लखनवी साहब की इस पहल को इसी कमी को दूर करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। बताया जाता है कि उन्होंने लगभग पांच वर्ष पहले से तरही शब-बेदारी का सिलसिला शुरू किया, ताकि अज़ादार दोबारा नौहा सुनने के लिए जमा हों और नौहा-ख़्वानी के प्रति वही पुरानी दिलचस्पी पैदा हो सके। यह पहल केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि लखनऊ की अज़ादारी में नौहा सुनने और उसके मानी को महसूस करने की परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास है।
हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की शहादत के सिलसिले में आयोजन
जानकारी के मुताबिक, शब्बेदारी का आयोजन 2 जमादिउल- आख़िर को रात 9:30 बजे बैतुल हुज़्न, रुस्तम नगर, लखनऊ होगा। ये कार्यक्रम हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की शहादत के सिलसिले में रखा गया है।
इस अवसर पर पहले तिलावते कलामे पाक से आयोजन की शुरुवात होगी जिसके बाद मजलिस और फिर तरही शब-बेदारी का आग़ाज़ किया जाएगा। पोस्टर में नौहा-ख़्वानी के लिए तरही मिसरा भी दिया गया है:
“मदीने में बपा है एक क़यामत, दरे ज़हरा जलाया जा रहा है।”
इस मिसरे पर आधारित नौहे पढ़े जाएंगे। जानकारी के मुताबिक इस मिसरे में क़ाफ़िये जलाया, सताया तय किए गए हैं जबकि इसकी रदीफ़ ‘जा रहा है’ बताई गई है। इस तरही मिसरे के ज़रिये हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा पर हुए मज़ालिम और उनके मसायब को याद किया जाएगा।
दस अंजुमनों की शिरकत
आयोजकों की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक इस तरही शब्बेदारी में दस अंजुमनों के नाम शामिल है। इसमें अंजुमन रौनक़े दीन इस्लाम जनाब एजाज़ जैदी साहब का,अंजुमनन ज़ियाउल ईमान जनाब सुल्तान सुरूर साहब का,अंजुमन क़मरे बनी हाशिम जाबिर लखनवी का अंजुमन शाहे इंस ओ जाँ जनाब मौलाना अब्बास इरशाद का,अंजुमन नासिरुल इस्लाम — जनाब हिलाल नक़वी का,अंजुमन मासूमिया हुसैनिया जनाब फ़िदवी नक़वी साहब का,अंजुमन गुलज़ारे अहलेबैत जनाब कैफ़ ग़ाज़ीपुरी साहब का अंजुमन इस्लाहुल अज़ा जनाब हसन आबिद साहब का,
अंजुमन बर्क़ हैदरी जनाब रज़ा सफ़ीपुरी साहब का,अंजुमन नासिराने हुसैन जनाब रज़ा नक़वी साहब का कलाम पेश करेंगी।
इस शब्बेदारी की निज़ामत जनाब हैदर रज़ा और जनाब क़ारी नदीम नजफ़ी साहब करेंगे।
कार्यक्रम के कन्वीनर सैयद अली इमाम शान आबिदी हैं, जबकि जनाब मुस्लिम अब्बास मुंतज़िम के तौर पर दर्ज हैं।
अंजुमनों की कुआँ-अंदाज़ी पहली जमादिउल-आख़िर को होने वाली मजलिस के बाद होगी।

नौहा सुनने की परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश
लखनऊ की अज़ादारी में नौहा-ख़्वानी की पुरानी परंपरा को फिर से मज़बूत करने के लिए इस तरह के आयोजनों को अहम माना जा रहा है। नौहा केवल शब्दों और धुन का मेल नहीं, बल्कि करबला के मसायब को याद करने, शोहदाए करबला की क़ुर्बानियों को महसूस करने और अहलेबैत से अपनी अकीदत का इज़हार करने का ज़रिया है।
जनाब शान लखनवी साहब की इस पहल से उम्मीद की जा रही है कि अज़ादार नौहा-ख़्वानी सुनने के लिए फिर से उसी लगन के साथ जमा होंगे, जिस तरह पहले अंजुमनों के नौहे सुनने के लिए देर तक खड़े रहा करते थे। अगर यह सिलसिला आगे बढ़ता है, तो इससे लखनऊ की अज़ादारी में नौहा सुनने की पुरानी रौनक़ को लौटाने में मदद मिल सकती है।
इस आयोजन का मक़सद यही है कि नौहा शुरू होने पर मजमा बिखरने के बजाय अज़ादार ठहरें, नौहा सुनें और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम तथा अहलेबैत के ग़म में अपने आंसुओं का नज़राना पेश करें।






