Home UTTAR PRADESH लाउडस्पीकर से अजान देना इस्लाम का धार्मिक हिस्सा नहीं है:इलाहाबाद हाई कोर्ट

लाउडस्पीकर से अजान देना इस्लाम का धार्मिक हिस्सा नहीं है:इलाहाबाद हाई कोर्ट

ज़की भारतीय

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसले में साफ कर दिया कि लाउडस्पीकर से अजान पर रोक सही है।

लखनऊ संवाददाता । मंदिर, मस्जिद गिरजाघरों और गुरुद्वारों सहित अन्य समारोह में बजने वाले लाउडस्पीकर पर ध्वनि प्रदुषण को लेकर विगत एक वर्ष पूर्व माननीय उच्चन्यायलय द्वारा ध्वनि की त्रीवता के लिए गाँव, शहरों आबादी वाले क्षेत्रों के लिए अलग-अलग डेसीबेल निर्धारित किये गए थे जिसके पालन के लिए पुलिस ने अपने थानों पर बैठकें कर मुतवल्लियों, महंतों सहित अन्य धर्मों के लोगों को बुलाकर ये बात समझाई थी कि किसको कितने डेसेबेल पर लाऊड स्पीकर बजाना है । लेकिन आज इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मस्जिद से अजान दिए जाने पर स्पष्ट तौर से कहा है कि लाउडस्पीकर से अजान देना इस्लाम का धार्मिक हिस्सा नहीं है।जब्कि ये भी कहा कि यह जरूर है कि अजान देना इस्लाम का धार्मिक भाग है। इन दोनों बातों को पढ़ने के बाद आप भी सोच में पड़ जाएंगे , दोनों का क्या तात्पर्य है ?आगे कहा गया है कि इसलिए मस्जिदों से मोइज्जिन बिना लाउडस्पीकर अजान दे सकते हैं। मतलब अज़ान तो होगी लेकिन बिना लाऊडस्पीकर के ।कोर्ट ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण मुक्त नींद का अधिकार व्यक्ति के जीवन के मूल अधिकारों का हिस्सा है। किसी को भी अपने मूल अधिकारों के लिए दूसरे के मूल अधिकारों का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने मुख्य सचिव को आदेश दिया है कि जिलाधिकारियों से इसका अनुपालन कराएं।

बताते चलें ,यह आदेश न्यायमूर्ति शशिकांत गुप्ता व न्यायमूर्ति अजित कुमार की खंडपीठ ने गाजीपुर के सांसद अफजाल अंसारी व फर्र्रुखाबाद के सैयद मोहम्मद फैजल की याचिकाओं को निस्तारित करते हुए दिया है।
गाजीपुर के जिलाधिकारी ने मस्जिदों से लाउडस्पीकर से अजान देने पर रोक लगाने का मौखिक निर्देश दिया था। याची गाजीपुर से बहुजन समाज पार्टी के सांसद अफजाल अंसारी ने इसका विरोध किया। उन्होंने रमजान माह में लाउडस्पीकर से मस्जिद से अजान की अनुमति न देने को धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर हस्तक्षेप करने की मांग की थी। मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर ने इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करके सरकार का पक्ष पूछा था। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसले में साफ कर दिया कि लाउडस्पीकर से अजान पर रोक सही है। कोर्ट ने कहा कि जब लाउडस्पीकर नहीं था तब भी अजान होती थी। उस समय भी लोग मस्जिदों में नमाज पढ़ने के लिए एकत्र होते थे। ऐसे में यह नहीं कह सकते कि लाउडस्पीकर से अजान रोकना अनुच्छेद 25 के धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकारों का उल्लंघन है।
हालाँकि अदालत के आदेश पर सवाल उठाने का अधिकार किसी को नहीं है लेकिन अज़ान को
धार्मिक हिस्सा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि अज़ान सुनकर बहुत से मुसलमानों को पता चल जाता है कि नमाज़ का वक़्त हो गया है , और मुसलमान नमाज़ पढ़ने के लिए उठ जाता है ।
रही बात पहले भी अज़ान होती थी तो ये बात भी सही है लेकिन पहले पूजा भी होती थी, अखंड रामायण भी होती थी, विवाह भी होते थे ,मंदिरों में भजन भी होते थे गुरुद्वारों और गिरजाघरों में समारोह भी होते थे । पहले पत्र भेजे जाते थे, लालटेन की रौशनी में लोग पढ़ते थे पैदल लोग चलते थे घोड़ों और खच्चरों की सवारी होती थी पहले तलवारों, तीर बल्लम खंजर नैज़े से युद्ध होता था । लेकिन आज इंसान की तरक़्क़ी के कारण लोग मोबाईल के व्हाट्सऐप से अपनी ात कह रहे हैं ट्रेनों, कारों और जहाज़ से लोग सफर कर रहे हैं आज युद्ध अत्याधुनिक हथियारों से हो रहा है , विवाह समारोह में डीजे बज रहे हैं , भजन कीर्तन लाऊडस्पीकर पर हो रहे हैं रेलवे और एयर पोर्ट पर भी ऐलान लाऊडस्पीकर से किये जा रहे हैं । पहले अदालत के फैसले मिडिया नहीं बताता था लेकिन आज ज़माना बदल गया है । आज सबसे अधिक ध्वनि प्रदुषण मोटरसाईकिल हॉर्न कार और बसों के हॉर्न से हो रहा है । न तो हर समय मंदिर में पूजा होती है और न ही हर समय मस्जिदों से अज़ान ।
ये मेरे अपने मन की बात है जिसे मैंने लिख दिया यदि अदालत को मेरी बात न गवर गुज़रे तो मैं क्षमा चाहता हूँ । वैसे मेरे भारत में मुझे अपनी बात रखने की इतनी तो स्वतंत्रता मिली हुई है ।

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