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मोहसिन रज़ा से नाराज़ भाजपा अब क्या किसी और शिया कार्यकर्ता को नवाज़ने वाली है ?


ज़की भारती

लखनऊ, संवाददाता। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने में भले ही मूल रूप से मुसलमानों का योगदान नहीं रहा,लेकिन ऐसा भी नहीं के मुसलमानों ने कुछ प्रतिशत मतदान भाजपा के पक्ष में नहीं किया । हालाँकि यह अलग बात है कि भारतीय जनता पार्टी ने अपनी शंका का ठीकरा शिया संप्रदाय से बनाए गए मंत्री मोहसिन रज़ा के कांधों पर फोड़ा है। इसका मतलब, भारतीय जनता पार्टी ने शिया संप्रदाय द्वारा भाजपा को वोट ना किए जाने की बात को स्वीकार करते हुए उन्हें उनके पद से हटाया है | जबकि यह सरासर गलत है। मोहसिन रजा को उनके पद से हटाया जाना निजी प्रकरण तो हो सकता है लेकिन इसके लिए शिया संप्रदाय द्वारा भाजपा को वोट ना दिए जाने की बात को बुनियाद नहीं बनाया सकता है । भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता यह बात स्वयं जानते हैं, सुन्नी संप्रदाय द्वारा भारतीय जनता पार्टी को 0.1 प्रतिशत वोट भी नहीं दिया जाता है । कांग्रेस की बर्बादी के बाद से बिखरा हुआ मुसलमानों का वोट समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में पड़ता हुआ चला आ रहा है। हालांकि इस बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में किसी भी तरह से सपा सुप्रीमो व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी मुसलमानों से वोट मांगे जाने में कोई रुचि नहीं दिखाई थी। बावजूद इसके अधिकतर मुसलमानों ने भारतीय जनता पार्टी को करारी शिकस्त देने के कारण एकमत हो कर समाजवादी पार्टी को वोट किया था । जाहिर है दलित मतदाताओं नें बहन मायावती की पार्टी को अपना वोट करके अपनी वफादारी साबित की थी । इस बार भाजपा की सीटें तो कम आईं लेकिन वोटों का प्रतिशत बढ़ा था । अब भारतीय जनता पार्टी को सोचना चाहिए ,उनका जो 2 से 3 प्रतिशत वोट बढ़ा वह आखिर किसका था ? भारतीय जनता पार्टी से मुसलमानों अगर नाराज है तो इसका ठीकरा मोहसिन रज़ा के सर पर ना रखते हुए मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश योगी आदित्यनाथ के सर पर रखना चाहिए था । क्योंकि योगी आदित्यनाथ ने अपने चुनाव में 80 और 20 की बात कहकर मुसलमानों को यह संदेश दे दिया था कि उनको तुम्हारे वोट की कोई आवश्यकता नहीं है । इसके बावजूद मुसलमानों का लगभग 2 प्रतिशत वोट भारतीय जनता पार्टी की गोदी में आना इस बात को दर्शाता है कि भाजपा के मुस्लिम नेताओं ने अपने परिश्रम से अपनी क़ौम के मत हासिल किए।
इस बार भाजपा की विजय जातिवादता के नाम पर नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी की विजय उसकी बेहतर कार्यप्रणाली के चलते हुई है। यदि इसी प्रकार से भारतीय जनता पार्टी प्रदेश में जनता के प्रति बेहतर योजनाएं परोसती रही तो आने वाले समय में भारतीय जनता पार्टी को आगामी 2024 के लोकसभा चुनाव में किसी की ओर देखने की आवश्यकता नहीं होगी। चाहे चुनाव ईवीएम द्वारा संपन्न कराया जाए या फिर बैलेट पेपर से, लेकिन भाजपा की पुनः विजय संम्बव है। लेकिन अगर योगी जैसे मुख्यमंत्री जनता को दो अलग-अलग आंखों से देखेंगे और मुसलमानों से अपना दामन बचाते ही रहेंगे तो शायद लोकसभा 2024 का चुनाव केंद्र सरकार के लिए भारी पड़ सकता है।

केंद्र सरकार ने जहां तक जनता के प्रति कुछ अच्छी योजनाएं रखी हैं तो वहीं वो थोड़ी सेकलुर भी हुई है। लेकिन आम जनता पेट्रोल, डीज़ल और रसोई गैस की मार से कराह रही है । घरेलू गैस सिलेंडर सब्सिडी जब कांग्रेस की सरकार में बंद किये जाने की बात की गई थी तो, इसी भारतीय जनता पार्टी ने देश और प्रदेश व्यापी धरने प्रदर्शन करके सब्सिडी ना हटाए जाने की मांग की थी और इसी मुद्दे ने कांग्रेस सरकार की जड़ों को ऐसा उखाड़ा की आजतक वो जड़ें नहीं निकाल सकी। कांग्रेस के उस समय के पेट्रोलियम मंत्री ने जहाँ चुनाव से दो माह पूर्व जान बूझकर पेट्रोल,डीज़ल के दामों में निरंतर वृद्धि कर के जनता को नाराज़ किया वहीं गैस सब्सिडी खत्म किये जाने की बात कहकर अपने आक़ा की बात का पालन करते हुए कांग्रेस का खेल ख़त्म करवा दिया। ये वो आक़ा हैं जिनके हर राजनीतिक दल में लोग होते है।
कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. नरसिम्हा राव जी भी उसी आक़ा के ग़ुलाम थे। जबकि कांग्रेस ये सोचना ही नहीं चाहती है, उसका आखिरकार डाउन फाल कैसे हुआ ? बहरहाल यहां पर मेरा मुद्दा कांग्रेस को जीवन दान देने का नहीं,बल्कि मुद्दा है भारतीय जनता पार्टी से मुसलमानों की निकटता या बढ़ती हुई दूरियां का। भारतीय जनता पार्टी नें जिन मुसलमानों को अपनी पार्टी में जोड़ा था उनको मुसलमान समझ कर जोड़ा था,न कि हिन्दू समझ कर। लेकिन वह मुसलमान इस गलतफहमी में आए कि भारतीय जनता पार्टी एक कट्टरपंथी हिंदू संगठन द्वारा चलाई जाती है लिहाजा हम मुसलमान होने के बाद भी हिंदू बन जाए तो उचित होगा। आपने देखा होगा कि जो भी मुसलमान भारतीय जनता पार्टी में आया उसने धीरे-धीरे गेरुआ वस्त्र धारण करना शुरू किया ,मंदिरों पर माथा टेकना, भगवान राम ,लक्ष्मण , हनुमान सहित ढेरों देवी देवताओं की तस्वीरों के सामने अपना शीश झुकाना शुरू किया। यही नहीं हाथों में दिए जलाते हुए उन्हें पूजा अर्चना करते हुए भी देखा गया । जब इस तरह के घटनाक्रम बहुत बढ़ने लगे तो भारतीय जनता पार्टी के एक शीर्ष नेता ने मुसलमानों से यह बात कही के आप जिस धर्म से आए हैं उसी धर्म पर बाकी है तो उचित होगा। देखने में आया कि पूर्व शिया वक्फ बोर्ड चेयरमैन वसीम रिज़वी ने खुद को जेल ना जाने के डर और शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन की पुनः कुर्सी हासिल करने की लालच नें खुद को इस्लाम से ही खारिज करवा लिया,जबकि वो सिर्फ संघ के दो नेताओं की गोद मे बैठा था,जिसे भाजपा ने खुद से दूर रखा था ,बावजूद इसके वसीम ने जहां भारतीय जनता पार्टी और आर.एस.एस को खुश करने के लिए पवित्र ग्रंथ क़ुरआन के श्लोकों की तोहीन की वही उसने तौहीन की इन्तेहाँ पार करते हुए मुसलमानों के पैगंबर हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहे वालेही वसल्लम की शान में सलमान रुश्दी और तस्लीमा नसरीन से भी ऊपर निकलते हुए गुस्ताखियां करना शुरू की । नतीजा आपके सामने मौजूद है । भारतीय जनता पार्टी ने ना तो उसको गोद में लिया और ना ही शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड में उसके चेयरमैन के ख़्वाब को पूरा होने दिया। वसीम रिजवी जो खुद को नमरूद और शदाद्द समझने लगा था रावण से भी ऊपर समझने लगा था । आज वह जेल की सलाखों के पीछे बैठा हुआ आजाद सड़क देखने को तड़पता हुआ नजर आ रहा है । मुझे याद है कई वर्ष पूर्व जब अटल बिहारी बाजपेई अपनी विदेश यात्रा को जाने वाले थे और लखनऊ में एक शिया संप्रदाय के भाजपा कार्यकर्ता नें उनको तिलक लगाकर भगवान राम की मूर्ति गिफ्ट की तो अटल बिहारी वाजपेई नें उनसे नाराज होते हुए कहा कि आप अपना कल्चर क्यों भूल रहे हैं ? उन्होंने कहा,आपके इस तिलक लगाए जाने से और भगवान राम की मूर्ति दिए जाने से मैं खुश नहीं हुआ हूं । उन्होंने कहा कि जब आपके यहां कोई बाहर जाता है तो आप अपने धर्म के अनुसार जो करते हैं वह मेरे साथ करें तो उचित होगा । इस बात को सुनते ही वह महाशय शर्म से लाल हो गए। इस तरह की बातें सामने आती रही है ,लेकिन लोग सत्ता की लालच में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री से संबंध बनाए रखने की तमन्ना में अपने ही रीति रिवाज को भूल रहे हैं । वह शायद यह नहीं जानते, जिनके लिए वह ऐसे काम कर रहे हैं वह खुद भी समझते हैं कि जो व्यक्ति अपने धर्म का नहीं वह मेरा क्या हो सकता है ?
कोई भी व्यक्ति किसी भी राजनीतिक दल में रहने के लिए पूर्ण रुप से स्वतंत्र है । परंतु अपने धर्म की रीति रिवाज को भूलने वाला कभी भी तरक्की नहीं कर सकता । भारतीय जनता पार्टी ने जब मोहसिन रज़ा को पहली बार कई पद दिए तो मुझे याद है कि उन्होंने अपने निवास पर अपने लोगों को बुलाकर एक पार्टी की थी । जिसमें उन्होंने आखिर में एक बात कही थी जो मुझे आज तक याद है। उन्होंने कहा था , भारतीय जनता पार्टी नें मुझ पर इतना बड़ा एहसान किया है कि मैं हर वक्त अगर भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय की चौखट पर अपना सर झुकाए पड़ा रहूं तो भी कम है। अगर उनमे कोई सलाहियत नहीं थी तो फिर भारतीय जनता पार्टी नें उन पर यह एहसान किया ही क्यों था? अगर भारतीय जनता पार्टी ने मोहसिन रजा को पूर्ण रूप से पैदल ही किया है तो किसी और शिया को उनके स्थान पर रखना चाहिए । दानिश अंसारी को पुराने कार्यकर्ता की हैसियत से जो तमगा दिया गया है वह उसके क़ाबिल थे । लेकिन अहले सुन्नत में भी कुंवर बासित अली सहित ढेरों और भी ऐसे भाजपा कार्यकर्ता है, जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी को उस वक्त चुना था जिस वक्त भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में उड़ने वाली वह मक्खियां भी आने को तैयार नहीं हुआ करती थी जिनको कोई पूछता तक नहीं । ऐसे लोगों की तरफ भी भाजपा को ध्यान देना चाहिए । दानिश अंसारी के अलावा भी सुन्नी संप्रदाय से अपने कार्यकर्ताओं को बड़े पदों से नवाज़ा जाना चाहिए। यही नहीं शिया संप्रदाय से तूरज ज़ैदी ने भी भारतीय जनता पार्टी का दामन तब थामा था जिस वक्त भाजपा को कोई अच्छी निगाह से देखता तक नहीं था । यह अलग बात है कि उनको अभी पूर्व में ही फखरुद्दीन अली अहमद मेमोरियल कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है। लेकिन पुनः सरकार बनने पर उन्हें भी किसी बड़े पद से नवाज़ा जाना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी के लिए शिया सम्प्रदाय से जहां मुस्लिम राष्ट्रीय मंच को छोड़ने के बाद भारतीय जनता पार्टी के लिए दिन-रात एक करने वाले हसन कौसर रिजवी ने भी भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे में रहकर भाजपा के लिए जमकर प्रचार किया वहीं भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के अमील शम्सी ने भी भाजपा के लिए गली-गली पैदल निकलकर एक एक घर पहुंच कर लोगों से भारतीय जनता पार्टी को वोट किए जाने की अपील की थी । उम्मीद है कि भारतीय जनता पार्टी इन नामों के तरफ भी जल्द ही ध्यान देगी।

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