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तमाम विरोध के बावजूद एनआरसी लिस्ट से कटे लगभग 10 लाख भारतीयों के नाम

लखनऊ (सवांददाता) नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन के मामले पर अभी हाल ही में जारी की गई जिस सूची पर तमाम राजनितिक दलों ने संसद से लेकर सड़क तक विरोध दर्ज कराया था उसी मामले को लेकर 10 लाख नाम तो भारतीयों के ही कट गए हैं। अब जिन भारतियों के नाम लिस्ट से काटे गए हैं वो भारतीय होने के बावजूद घुसपैठिया का दर्जा पाने लगे हैं| असम में बहुत परिवार तो ऐसे हैं जो आजादी या उससे पहले से ही भारत में रह रहे हैं, लेकिन एनआरसी के दस्तावेज में उनका नाम शामिल नहीं हैं। इसके अलावा असम के सीमावर्ती जिलों में मुस्लिम समुदाय की तादाद ज्यादा है, लेकिन यहाँ पर 85 फीसदी परिवार घुसपैठियों की श्रेणी में आ गए हैं।
सूत्रों के अनुसार गृह मंत्रालय में उत्तर पूर्व के मामले और खासतौर पर, एनआरसी की प्रक्रिया देख रहे एक अधिकारी ने यह खुलासा किया है। उनके मुताबिक, एनआरसी ने अपने दस्तावेज में भले ही 40 लाख लोगों का नाम काटकर उन्हें एक झटके में घुसपैठिया बना दिया है, लेकिन ऐसा नहीं है। इस सूची को तैयार करने के दौरान बहुत सी तकनीकी गलतियां हुई हैं। करीब 10 लाख भारतीय जो किसी दूसरे राज्य से कामकाज या नौकरी के चलते असम में जाकर बस गए थे, उनका नाम भी एनआरसी दस्तावेज में गायब है।

बहुत से परिवार ऐसे भी हैं जो आजादी के समय या उससे पहले से यहां रह रहे हैं, उन्हें भी एनआरसी ने असम का नागरिक नहीं माना है। ऐसे लोगों ने एनआरसी को अपना आवेदन भेजना शुरू कर दिया है। हालांकि अभी तक एनआरसी की तरफ से उनके पास बातचीत या अपना पक्ष रखने के लिए बुलावा नहीं आया है। दूसरे भारतीय राज्यों के नागरिक जो असम में जाकर बसे थे और अब उन्हें बाहरी बताया जा रहा है, उनमें पश्चिम बंगाल पहले नम्बर पर है। दूसरे स्थान पर उत्तरप्रदेश, तीसरे पर बिहार, चौथे पर राजस्थान और पांचवे पर उत्तरपूर्व के राज्य आते हैं।
यही नहीं सिलचर में रह रहे विधायक दिलीप पाल और उनकी पत्नी अर्चना पाल का नाम भी एनआरसी की सूची में नहीं है| उनका कहना है कि बॉर्डर के इलाकों में रहने वाले लोग तनाव में हैं। यहां औसतन हर गली मोहल्ले में किसी न किसी का नाम कट गया है। वहां कई इलाकों में मुस्लिम समुदाय की तादाद ज्यादा है। इनमें बहुत से लोग ऐसे हैं जो कई दशकों से असम में रह रहे हैं, इसके बावजूद एनआरसी ने उन्हें स्थानीय नागरिक नहीं माना।

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