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ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से

ज़की भारतीय

लखनऊ,संवाददाता | ये बात अलग है कि कोरोना वायरस ने संसार भर में लोगों की ज़िन्दगी के साथ जमकर मौत का खेल खेला और अभी भी उसका ये खेल जारी है | लेकिन ये भी सच है कि कोरोना ने लोगों को मौत भी दिखा दी | जो लोग मौत को भूल जाते हैं वो लोग खुद को अमर समझने लगते हैं और संसार के लिए खतरनाक रूप धारण कर लेते हैं | और इस बात का इतिहास गवाह है | कल जो लोग ये कहते हुए नज़र आ रहे थे कि क़यामत अभी नहीं आने वाली आज वो भी एक ऐसे वायरस से डरे और सहमे हुए हैं जो उनकी आँखों को नज़र तक नहीं आता | आज वो भयभीत होकर अपने चेहरे को छुपाए हुए घरों में बैठे हैं | चाहे क़यामत कहो या प्रलय ,वो तो एक दिन आना ही है ,जिस तरह मौत यानि मृत्यु है ,जिसका स्वाद सबको चखना है, इससे कोई भी नहीं बच सकता | यदि मनुष्य हर दिन ये सोचकर ज़िंदा रहे कि उसे अभी मर जाना है तो शायद हर पल पुन्ह के कार्य करता रहे और दिलों में एक दूसरे के विरुद्ध पैदा नफरत पर भी पूर्ण विराम लग जाए | लेकिन . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .

जिसने सोचा ही नहीं मौत के बारे में कभी |
कैसे फिर खाहिशे दुनिया से वो बहार निकले ||

यहाँ पर अपना ये शेर लिखकर अपनी बात को आपतक पहुंचने का मेरा एक आखरी प्रयास है | मनुष्य का जीवन सिर्फ 3 दिन का होता है | उसमे भी एक दिन गुज़र गया और आने वाले दिन की गारंटी नहीं जबकि जिस दिन में जी रहे हो उसमे में किसी भी पल मौत आ सकती है | इसलिए मनुष्य किस बात के घमंड में रहता है | तुमको ईश्वर ने मनुष्य बनाया है ,इसलिए मनुष्य बनों न कि राक्षस | मनुष्य को जब संसार की लालसा आकर्षित करे तो उसे चाहिए कि वो शमशान या क़ब्रस्तान जा कर बैठ जाए और देखे कि उससे पहले ज़िंदा लोगों का अंत क्या हुआ | कल जिन्हें अपनी ताक़त अपनी हुकूमत पर गर्व था आज उनका बेबस और मजबूर शरीर मिटटी में मिलता जा रहा है और आत्मा किसी से बात करने के लिए भी मोहताज हो चुकी है | ये वही लोग थे जिनकी हुकूमतों और उनकी शक्ति के डंके बजते थे लेकिन अफ़सोस आज उनकी क़ब्रों के निशान तक तेज़ हवाओं ने मिटा डाले |
मैंने बचपन में जिसे पढ़कर खुद में बदलाव पाया वो आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ |

ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से

रामधारी सिंह दिनकर

मेरे घर के दाहिने एक वकील रहते हैं,जो खाने पीने में अच्छे हैं दोस्तों को भी खूब खिलाते हैं और सभा सोसाइटियों में भी भाग लेते हैं। बाल बच्चों से भरा पूरा परिवार नौकर भी सुख देने वाले और पत्नी भी अत्यन्त मृदुभाषिणि। भला एक सुखी मनुष्य को और क्या चाहिए। मगर वे सुखी नहीं हैं। उनके भीतर कौन.सा दाह है, इसे मैं भली-भांति जानता हूँ। दरअहसल उनके बगल में जो वीमा एजेंट हैं उनके विभव की वृद्धि से वकील साहब का कलेजा जलता है। वकील साहब को जो भगवान ने जों कुछ देखा है, वह उनके लिए काफी नहीं दिखता। वह इस चिन्ता में भुने जा रहे हैं कि काश एजेन्ट की मोटर उनकी मासिक आय और उसकी तड़क-भड़क मेरी भी हुई होती।
ईष्या का यही अनोखा वरदान है। जिस हृदय में ईष्या घर बना लेती है, वह उन चीजों से आनन्द नहीं ले उठाता जो उसके पास मौजूद हैं, बल्कि उन वस्तुओं से दुःख उठाता है, जो दूसरो के साथ करता है और इस तुलना में अपने पक्ष के सभी अभाव उसके हृदय पर दंश मारते रहते है। दंश के इस दाह को भोगना कोई अच्छी बात नहीं है। मगर ईर्ष्यालु मनुष्य करे भी तो क्या ? आदत से यह लाचार होकर उसे यह वेदना भोगनी पड़ती है।
एक उपवन को पाकर भगवान को धन्यवाद देते हुए उसका अनन्द नहीं लेना और बराबर इस चिंता में निमग्न रहना कि इससे भी बड़ा उपवन क्यों नहीं मिला, एक ऐसा दोष है। जिससे ईर्ष्यालु व्यक्ति का चरित्र भी भंयकर हो उठता है। अपने अभाव पर दिन रात सोचते वह सृष्टि की प्रक्रिया को भूलकर विनाश में लग जाता है। और अपनी उन्नति के लिए उद्यम करना छोड़कर वह दूसरों को हानि पहुंचाने का ही अपना श्रेष्ठ कर्तव्य समझने लगता है।
ईर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम निन्दा है। जो व्यक्ति ईर्ष्यालु होता है। वही बुरे किस्म का निन्दक भी होता है। दूसरों की निन्दा वह इसलिए करता है कि इस प्रकार दूसरे लोग जनता अथवा मित्रों की आखों से गिर जाए और जो स्थान रिक्त उस पर मैं अनायास ही बैठा दिया जाऊगा।
मगर ऐसा न आज तक हुआ और न होगा। दूसरों को गिराने की कोशिश तो अपने बढ़ाने की कोशिश नहीं कही जा सकती। एक बात और है कि संसार में कोई भी मनुष्य निन्दा से नहीं गिरता। उसके पतन का कारण सद्गुणों का ह्रास होता है। इसी प्रकार कोई भी मनुष्य दुसरों की निन्दा करने से अपनी उन्नति नही कर सकता। उन्नति तो उसकी तभी होगी जब वह अपने चरित्र को निर्मल बनाए तथा गुणों का विकास करे।
ईर्ष्या का काम जलाना है मगर सबसे पहले वह उसी को जलाती है जिसके हृदय में उसका जन्म होता है। आप भी ऐंसे बहुत से लोगो को जानते होंगे जो ईर्ष्या और द्वेष की साकार मृर्ति हैं और जो बराबर इस फिक्र में लगें रहते हैं कि कहां सुनने वाला मिले और अपने दिल का गुबार निकालने का मौका मिले। श्रोता मिलते ही उनका ग्राफोफोन बजने लगता हैं, और वे बड़ी ही होशियारि के साथ एक-एक काण्ड इस ढंग से सुनाते रहे हैं मानें विश्व कल्याण को छोड़कर उनका और कोई ध्येय नहीं हो। अगर जरा इतिहास को देखिए और समझने का कोशिश किजिए कि जब से उन्होंने इस सुकर्म का आरम्भ किया है तब से वे अपने क्षेत्र में आगे बढे़ हैं या पीछे हटे हैं। यह भी कि वे निन्दा करने में समय और शक्ति का अपव्यय नहीं करते तो आज इनका स्थान कहां होता ?
चिन्ता को लोग चिता कहते है। जिसे किसी प्रचंड चिंता ने पकड़ लिया है, उस बेचारे की जिन्दगी ही खराब हो जाती है। ईर्ष्या शायद फिर चिन्ता से भी बदतर चीज है क्योंकि वह मनुष्य के मौलिक गुणों को ही कुंठित बना डालता है।
मृत्यु शायद फिर भी श्रेष्ठ हैं बनिस्बत इसके कि हमें अपने गुणों को ही कुंठित बना देता है। दग्ध व्यक्ति समाज की दया का पात्र हैं। किंतु ईर्ष्या से जला-भुना आदमी जहर की एक चलती-फिरती गठरी के समान है जो हर जगह वायु को दूषित करति फिरती है।
ईर्ष्या मनुष्य का चारित्रिक दोष ही नहीं है, प्रत्त्युत इससे मनुष्य के आनन्द में भी बाधा पडती है। जब भी मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या का उदय होता है, सामने का सुख उसे मद्धिम सा दिखने लगता है। पक्षियों के गीत में जादू नहीं रह जाता और फूल तो ऐसे हो जाते हैं, मानो वह देखने के योग्य ही न हों।
आप कहेंगे कि निन्दा के बाण से अपने प्रतिद्वन्द्वियों को बेधकर हंसने में एक आनन्द है और यह आनन्द ईर्ष्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार है। मगर यह हंसी मनुष्य की नहीं राक्षस की हंसी है, यह आनन्द भी दैत्यों का आनन्द होता है।
ईर्ष्या का एक पक्ष सचमुच ही लाभदायक हो सकता है। जिसके आधीन हर जाति और हर दल अपने को अपने प्रतिद्वंद्वी का समकक्ष बनाना चाहता है। किन्तु यह तभी संभव है जबकि ईर्ष्या से जो प्रेरणा आती हो, वह रचनात्मक हो अक्सर तो ऐसा ही होता है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति यह महसूस करता है कि कोई चीज है जो उसके भीतर नहीं है कोई वस्तु हैं,जो दूसरों के पास है, किन्तु वह नहीं समझा पाता किस वस्तु को प्राप्त कैसे करना चाहिए और गुस्से में आकर वह अपने किसी पड़ोसी, मित्र या समकालीन व्यक्ति को अपने से श्रेष्ठ मानकर उससे जलने लगता है जबकि ये लोग भी अपने अपने से सायद वैसे ही असन्तुष्ट हों।
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जब तजरुबे से होकर गुजरे, तब उन्होंने एक सूत्र कहा- तुम्हारी निन्दा वही करेगा जिसकी तुमने भलाई की हैं।,,
आपने यही देखा होगा कि शरीफ लोग यह सोचते हुए सिर खुजलाया करते हैं कि आदमी मुझेसे क्यों जलता है मैंनें तो उसका कुछ नहीं विगाड़ा और अमुक व्यक्ति इस निन्दा में क्यों लगा है ? सच तो यह है कि मैंने सबसे अधिक भलाई उसी की की है।

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